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पंचकल्याणक महोत्सव : गर्भकल्याणक के उत्तर रूप में दिखाई गई कई क्रियाएं, मुनि श्री के प्रवचन भी हुए


नंदीश्वर कॉलोनी स्थित आदिनाथ धाम त्रिकाल चौबीसी के पंचकल्याणक महोत्सव में रविवार को गर्भ कल्याणक का उत्तर रूप दिखाया गया। रविवार को गर्भ कल्याणक की पूजन की गई। पढ़िए राजीव सिंघई की विस्तृत रिपोर्ट…


टीकमगढ़। शहर की नंदीश्वर कॉलोनी स्थित आदिनाथ धाम त्रिकाल चौबीसी के पंचकल्याणक महोत्सव में रविवार को गर्भ कल्याणक का उत्तर रूप दिखाया गया। रविवार को गर्भ कल्याणक की पूजन की गई। प्रातः 6:00 बजे से मंगलाष्टक, रक्षा मंत्र, श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा जैसे कई कार्यक्रम हुए। इसके बाद पूजा संपन्न हुई। 8:30 से निर्यापक मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज आदिनाथ मंदिर ढोगा से आकर मंच पर विराजमान हुए। मुनि श्री के पाद प्रक्षालन और चित्र अनावरण का सौभाग्य सुंदर लाल, अशोक जैन एवं सुरेश जैन, निर्भय जैन को प्राप्त हुआ।

जो भी तुम्हारे पास है उसको पूर्ण समझो

मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा कि व्यक्ति के पास जो होता है, उसका सुख उसे नहीं होता। जो उसके पास नहीं होता है, उसकी कमी उसे सताती है। कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसका विरोधी पक्ष ना हो, दुनिया का कोई ऐसा शब्द नहीं हुआ जिसका विरोधी शब्द ना हुआ हो। प्रत्येक इंद्रीय अपना स्वतंत्र कार्य करती है। एक इंद्रीय दूसरी इंद्रीय का सहयोग नहीं करती। जब हमारी आंख में परेशानी होती है तो कान इंद्रीय उसका सहयोग नहीं करती। मुनि श्री ने कहा कि जब हमारे शरीर की इंद्रियां भी हमारे बस में नहीं हैं फिर हम दूसरों से सहयोग की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं। ये पांचों इंद्रियां स्वतंत्र कार्य करती हैं। ऐसे ही आत्मा के गुण अपना स्वतंत्र कार्य करते हैं। जैन दर्शन कहता है कि जो भी तुम्हारे पास है, उसको पूर्ण समझो, संपूर्ण समझो। अपनी सत्ता स्वाधीन रखो। अपने गुणों को मजबूत करना है। सब कुछ होते हुए भी तुम्हें महसूस करना होगा कि हमारा कोई नहीं है। दर्शन को इतना समर्थ मान लो कि जब हम कोई पदार्थ देखना चाहे तो हमें देखने की अनुभूति होना चाहिए। सत्य को चुनौती के रूप में स्वीकार करना है। हमें सत्य से ऊपर उठना है। रात है यह सत्य है, लेकिन रात्रि में दिन की अनुभूति हो जाए, यह चमत्कार है।

मनाया जाएगा जन्मोत्सव

सोमवार को सुबह 7:48 बजे बालक आदिकुमार का जन्म होगा। इसके लिए संपूर्ण अयोध्या नगरी को सजाया गया है। घर-घर जन्म की खुशियों में दीपक जलाए जाएंगे। मिठाई बांटी जाएगी। एक पल तो नारकीय जीवों को भी नरक में शांति का अनुभव होता है। यह सब बालक आदिकुमार के जन्म के प्रभाव के कारण होता है। तीर्थंकर के गर्भ में आने के 6माह पहले से ही देवता उनकी भावी जन्म नगरी में दिव्य रत्नों की वर्षा 15 माह तक लगातार रोज करते हैं तीर्थंकर को जन्म देने वाली मां को 16 स्वप्न दिखाई देते हैं। तीर्थंकर के जन्म से सौधर्म इन्द्र का आसन कंपायमान होता है व अन्य चारों निकाय के देवों के महलों में भी विचित्र संकेत होते हैं व नरक के जीवों को भी कुछ क्षण की शांति मिलती है। तीर्थंकर के जन्म के बाद सौधर्म इन्द्र बालक को ऐरावत हाथी पर बिठाकर सुमेरु पर्वत पर ले जा कर अभिषेक कर असंख्य देवों के साथ तीर्थंकर का जन्म कल्याणक मनाते हैं।

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