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संत का परम संत से संवाद, लिखी अभिनंदन पाति : मुनि श्री पुण्य सागर जी ने आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी की तपश्यर्या का किया अभिनंदन


सारांश

आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के महाव्रत के महापारणा के अवसर पर मुनि पुण्य सागर जी ने आचार्य श्री के नाम एक अभिनंदन पाति (पत्र) लिखी है । पढ़िए जब एक संत, दूसरे परम संत का अभिनंदन करते हैं, तो क्या और कैसे लिखते हैं ? मुनि पुण्य सागर जी महाराज ने लिखी अभिनंदन पाति, आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी के नाम….जिसे आप तक पहुंचा रहे हैं गुवाहाटी से अजित जैन अपनी रिपोर्ट में….


28 जनवरी 2023 सम्मेद शिखर सिद्धक्षेत्र में मुनि पुण्य सागर जी महाराज, जो कि पंचम पट्टाधीन वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघस्थ हैं । उन्होनें आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज की मानवता और जिन धर्म के लिे महापारणा की अप्रीतम उपलब्धि के लिए अभिनंदन पाति लिखी है। जिसमें मुनि श्री लिखते हैं कि” साधना महोदधि अन्तर्मना परम पूज्य आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज को श्रद्धा, विनय एवं वात्सल्य पूर्वक स्नेहाभिवंदन । तपस्वियों के मूल नायक प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती श्री शान्ति सागर जी महाराज के पश्चात् परम्परागत 21 वीं सदी के प्रथम तपो कुंज, तपस्वियों के मसीहा, तपोनुष्ठान के शिखर, व्रतों के हिमालय, प्रथम निर्दोष तपस्वी साधक अपार तेज पूंज के स्वामी परमपूज्य अन्तर्मना की व्यक्तित्व कृतित्व अनुपम है ।

जिनके जीवन में आचार्य शान्ति सागरजी महाराज जैसी दृढ़ संकल्प शक्ति, चतुर्थ पट्टाधीश गुरुदेव आचार्य श्री अजित सागरजी महाराज जैसी चिन्तन शक्ति पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागरजी महाराज जैसी ज्ञान शक्ति, आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज जैसी आकर्षण शक्ति एवं आचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज जैसी ओजस्वी वाणी से युक्त 18 माह की साधना काल में जिनागम के 108 ग्रन्थों के अध्येता अन्तर्मना संप्रति युग में चतुर्थ कालीन साधना को पंचम काल में करने वाले सर्वोत्कृष्ट सिंह निस्क्रीडित तप की 557 दिन ( 496 निर्जल उपवास + 61 पारणा ) की मौन साधना पूर्वक सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र स्वर्णभद्र टोंक पर जिन्होंने पूर्ण की । उस साधना की सन्निकटता का सौभाग्य मुझे मिला ।

अन्तर्मना के इस महा पारणा महोत्सव की पावन बेला में आपको “लोकोत्तर महा तपस्वी” की मानद उपाधि से अलंकृत कर अत्यंत गौरवान्वित होते हुए मंगल भावना करते है कि आप स्वस्थ रहे, दीर्घायु हो, आपकी तपश्चर्या का पुण्य यशोगान विश्व में युगों-युगों तक गुंजायमान हो मैं, मेरे संधस्थ मुनि आर्यिका, बाल ब्र वीणा दीदी आदि को सेवा वैयावृत्य का पुनः अवसर मिले ऐसी मंगल भावना के साथ “वर्धतां जिन शासनम् ।”

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