सारांश
ऐसे सम्यग्दृष्टि पुरुष, जो संसार रूपी महासागर में पड़े हुए जीवों को उठाकर अपनी आत्मा के शुद्ध स्वरूप में स्थापन करने के लिए प्रयत्न करते रहते हैं । ऐसे पुरुष तीर्थंकर होने योग्य पुण्य प्रकृति का बंध करते हैं । तीर्थंकर होने का अर्थ क्या है ? विस्तारपूर्वक पढ़िए …
जो पुरुष शुद्ध सम्यग्दृष्टि के होते हैं यानि सभी को एक समान दृष्टि से देखते हैं । सोलह कारण भावनाओं का चितवन करते रहते हैं और जो समस्त जीवों के दुःखों को दूर करने की तथा सबको मोक्ष प्राप्त करा देने की भावना रखते हैं ऐसे जीवों के तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है ।
अपने सम्यग्दर्शन को निर्मल रखना, पंच परमेष्ठियोंकी विनय करना शील और व्रतोंको अतिचार रहित पालन करना, निरंतर ज्ञानका अभ्यास करना, संसारसे भयभीत रहना, शक्ति के अनुसार तप करना, शक्ति के अनुसार दान देना, साधुओं की सेवा करना, वैयावृत्य करना, अरहंतदेवकी भक्ति करना, आचार्य परमेष्ठीकी भक्ति करना, उपाध्यायोंकी भक्ति करना, शास्त्र की भक्ति करना, छह आवश्यकोंको कभी न छोड़ना, धर्मकी प्रभावना करना और धर्मात्माओंमें अनुराग रखना ये सोलह भावनाएँ हैं। इनका चितन करनेसे तीर्थंकर प्रकृतिका बंध होता है ।













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