सारांश
कृष्णगढ़ की धरा श्री जिनेन्द्र पंचकल्याणक महोत्सव के कारण श्री जिनेन्द्रमय हो रखी है। विगत सात दिन से कला, व्यापार, शिक्षा व धर्म की नगरी में ना केवल देश के कोने कोने से अपितु विश्व के कई देश से श्रावक श्राविकाएं श्री जिनेन्द्र पंच कल्याणक महोत्सव के साक्षी बनने के लिए आ रहें है। पढ़िए वि्स्तार से हमारे सहयोगी श्याम मनोहर पाठक की रिपोर्ट
किशनगढ़ की धरती पर भगवान श्री जिनेन्द्र की जय-जयकार हो रही है। इसके लिए पूरे किशनगढ़ को उत्तर से दक्षिण व पूरब से पश्चिम तक दुल्हन की तरह सजाया गया है। शाम होते ही किशनगढ़ के पंच कल्याण महोत्सव पर सजे किशनगढ़ को देखने के लिए श्रद्धा का सैलाब उमड़ रहा है। हर जाति धर्म का प्राणी इस ऐतिहासिक पर्व का साक्षी बनने को आतुर है। अपने आराध्य को स्थापित करने को लेकर पूरा दिगबंर जैन समाज एका के साथ कंधा से कंधा मिलकार धर्म प्रभावना करने में लगा है। सुबह से लेकर देर रात्रि तक धर्म की बयार में बहने के लिए भक्त भक्तिभाव से समाए हुए है।
मन-भावन शाही शोभायात्रा
श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन पंचायत व सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक महोत्सव के शुभारंभ पर ऐतिहासिक घटयात्रा निकाली गई। अजमेर रोड स्थित डाक बंगले से रवाना हुई यात्रा में विभिन्न क्षेत्रों से जैन समाज के लोग उमड़े। घटयात्रा में जहां 1008 महिलाओं ने कलश धारण कर यात्रा को ऐतिहासिक बनाया वहीं शाही लवाजमे और हाथी-घोड़ा व रथ के साथ निकली यात्रा के स्वागत में जगह-जगह पुष्पवर्षा की गई।
वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य एवं गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी ससंघ की मौजूदगी में यात्रा के क्रिस्टल पार्क के पास वर्धमान सभागार पहुंचने पर महोत्सव का विधिवत ध्वजारोहण कर महोत्सव का शुभारंभ किया गया। यात्रा के दौरान ना केवल जैन समाज अपितु छत्तीस कौम के लोग जैन समाज के साथ कंधा से कंधा मिलकार चल रहे थे।
श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के शुभारंभ के पहले दिन गर्भकल्याणक पूर्वार्द्ध पर नांदी मंगल अनुष्ठान, सौधर्म इंद्र सहित सभी इंद्र परिवार द्वारा की गई। बाद में श्रीजी को सोने व चांदी के तीनों रथ में विराजित किया गया। पंच कल्याण महोत्सव न केवल राजस्थान अपितु देश का पांचवा सबसे बड़ा ऐतिहासिक कार्यक्रम है सवा सौ वर्ष बाद किशनगढ़ में इसका आयोजन किया जा रहा है। आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज को जैन आर्मी सेना की ओर से 5 तोपों की सलामी देकर नमन किया गया।
मनहर प्रवचनों की पावन वर्षा
वर्धमान सभागार में गर्भकल्याणक पूर्वार्द्ध पर प्रवचन देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि सुख केवल मनुष्य भव में प्राप्त होता है जो नाश नहीं हो सकता है। हमें तीर्थंकर प्रभु की शरण प्राप्त करनी चाहिए। जिन धर्म जिनेंद्र देव की शरण में आने से हमें सुख, हित और आनंद मिलता है। तीर्थंकर प्रभु ने भी मनुष्य पर्याय को प्राप्त करके सिद्ध पद को प्राप्त किया है इसलिए जिन धर्म और जिन शासन हितकारी व देने वाले है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में पाषाण और धातु की प्रतिमा में जिनत्व की स्थापना की जाती है इसलिए सभी को अपनी शक्ति और सामर्थ्य अनुसार परिणामों को निर्मल बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंचकल्याणक मनोरंजन के साधन नहीं है ,इससे हमें मन की स्थिरता को प्राप्त कर जिन धर्म और उसके नियम को समझना चाहिए। जो सुख देता है धर्म रूपी अनुष्ठान में धर्म को समझकर सुखी बनने का प्रयास करना चाहिए।
मंदिर में 107 प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा
किशनगढ़ के इतिहास में जैन समाज के प्रथम जैन मंदिर चन्द्र प्रभु दिगबंर जैन मंदिर में आचार्य श्री व संघ के सानिंध में 107 जैन प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा विधि विधान से की जाएगी। मालूम हो इस मंदिर के पुर्ननिर्माण के लिए शिलान्यास कार्यक्रम गणिनी आर्यिका स्यादवाद मति माता जी के सानिध्य में 13 अप्रैल 2013 को की गई। मंदिर 1956 से रजिस्टर्ड है। मंदिर निर्माण पर करीब 14 करोड़ खर्च किए गए है। यह स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। 11 मंत्र शास्त्र के ज्ञाता इनकी प्राण प्रतिष्ठा कराने में जुटे है।













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