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गणाचार्य विरागसागर की जन्म भूमि पथरिया में मनाया 40वां मुनि दीक्षा दिवस

पथरिया ( राजेश जैन रागी / रत्नेश जैन बकस्वाहा)। परम पूज्य भारत गौरव राष्ट्रसंत गणाचार्य 108 विराग सागर जी महाराज का 40वां गुरु उपकार दिवस (मुनि दीक्षा महोत्सव) विविध कार्यक्रमों के साथ हर्षोल्लास से बीते सोमवार उन्हीं की जन्म भूमि पथरिया नगर में उन्हीं के मंगल सानिध्य में आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर धर्मशाला प्रांगण मे संपन्न मनाया गया।

इस अवसर पर युवाओं ने संपूर्ण पथरिया नगर में वाहन रैली धर्म ध्वज एवं जयकारों के साथ निकाली तथा जैन समाज ने आचार्य परमेष्ठी विधान किया और 40 थालियों में पाद प्रक्षालन, 40 शास्त्र भेंट कर गुरु भक्ति चरणों में समर्पित की। इस अवसर पर कारंजा भिंड, गढ़ाकोटा, बीना, दमोह, झांसी, सागर सहित बुन्देलखण्ड के विभिन्न अंचलों से गुरु भक्तों ने पधारकर आचार्यश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

हुकुमचंद जैन छोरे कारंजा बालों ने पूज्य गुरुवर के क्षुल्लक अवस्था की स्मृतियां को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि पूज्य आचार्य श्री ने 44 वर्ष पूर्व क्षुल्लक अवस्था में हमारे नगर कारंजा में चातुर्मास कर अपनी संयम क्रिया के द्वारा समस्त कारंजा को धर्म से जोड़ा था। उन्हें छोटे क्षुल्लक जी को आज इतने बड़े आचार्य के रूप में पाकर आनंदित हूं।

इस अवसर पर पूज्य गुरुवर आचार्यश्री ने अपनी दीक्षा के 40वर्षों का अनुभव बताते हुए कहा कि पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज की अनुकंपा और आशीष का ही प्रभाव है कि दीक्षा के 40 वर्ष संयम के साथ ऐसे बीते कि समय का ही पता नहीं चला। आचार्य श्री ने कहा कि जीवन मिला है तो संयम धारण कर लीजिए क्योंकि मनुष्य पर्याय बड़ा दुर्लभ है।

आज हमें मनुष्य भव मिला, यदि धर्म के साथ बिताया तो निश्चित ही सद्गति होगी और यदि यूं ही भोगों में बिताई तो निश्चित है कि दुर्गति में ही जाना पड़ेगा। मैं भी क्षुलल्क अवस्था में पूज्य आचार्य श्री के पास मात्र दर्शन करने गया था किंतु पूज्य गुरुदेव का ऐसा प्रभाव पड़ा और आचार्य गुरुदेव ने अपने निमित्त ज्ञान के द्वारा पहले ही बोल दिया कि तू मेरे पास ही दीक्षा लेगा, यद्यपि मैंने तो ऐसा विचार ही नहीं किया था किंतु काल लब्धि और योग्य निमित्त ही कहें कि मेरी दीक्षा पूज्य गुरुदेव के कर कमलों से ही हो गई। आज 40 वर्ष हो गए इस पावन अवसर को।

उन्हीं गुरुदेव की अनुकंपा रही दीक्षोपरांत उनका संबल बना रहा और सहज ही उन्नति के रास्ते खुलते गए। ज्ञातव्य है कि पूज्य गणाचार्य गुरुदेव की मुनि दीक्षा महाराष्ट्र औरंगाबाद में परम पूज्य निमित्त ज्ञानी आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज के द्वारा मगसिर शुक्ल सप्तमी (सन 1983) के पावन दिवस संपन्न हुई थी।

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