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षटरस त्यागी हो, तुम वैरागी हो, ज्ञानी- ध्यानी हो गुरुदेव गुरुदेव

षटरस त्यागी हो, तुम वैरागी हो, ज्ञानी- ध्यानी हो गुरुदेव गुरुदेव

 

इस संघ में जो वात्सल्य ओर आर्ष परम्परा देखने को मिली, वैसा कहीं भी नही

 

सम्मेदशिखर जी. राजकुमार अजमेरा | – अन्तर्मना साधना महोदधि, उभय मासोपवासी भीषण गर्मी के बडे़ व्रतों को करने पर्वतराज पर जा रहे थे तब स्थविराचार्य षटरस त्यागी आचार्य श्री सम्भव सागर जी ने अपनी पिच्छी अन्तर्मना को प्रदान की थी। जब अन्तर्मना 8 माह तक पारसनाथ स्वर्ण भद्र कूट पर अपनी मौन साधना को साधन करते हुए अपनी तपस्या को तपाकर 2 दिन पूर्व पहाड़ की वंदना करते हुए नीचे मधुबन में आए। 31 अक्टूबर को 216 घंटे बाद पारणा निरन्तराय सम्पन्न बिसपंथी कोठी में हुआ। पारणा के पश्चात लगभग 50 साधुगण के बीच पुनः स्थविरा षटरस त्यागी सम्मेदशिखर में विराजमान सबसे बड़े आचार्य श्री 108 संभव सागर जी महामुनिराज ने नूतन पिच्छी अन्तर्मना को प्रदान की ।

धन्य है इस आर्ष परम्परा का वात्सल्य। ऐसा वात्सल्य सभी दिगम्बर पिच्छी कमण्डल धारी साधु- सन्तो में आ जाये तो यह धर्म पंचमकाल के अन्तिम समय तक जीवन्त रह सकता है। वहां विराजमान सभी पिच्छीधारी मुनिराज ने अन्तर्मना की रत्नत्रय पूछकर अन्तर्मना के उत्कर्ष तपस्या की अनुमोदना की। इस विशेष अवसर पर हैदराबाद के मनोज चौधरी, भोपाल के बिट्टू जैन,आकाश जैन, कोलकोत्ता के विवेक गंगवाल, कोटा के अजय जैन, धनबाद से वंदना गंगवाल, कोडरमा से राज कुमार अजमेरा शामिल हुए।

सभी कार्यक्रम बिसपंथी कोठी में सम्पन्न हुआ। साथ ही 8 माह बाद गुरुवर की आरती सैकड़ो भक्तों ने की। कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा,मनीष सेठी ने यह जानकारी दी।

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