आलेख

इस दीपावली करें महावीर बनने का संकल्प

जयपुर.मनीष गोधा । इस वर्ष एक बार फिर हम भगवान महावीर का निर्वाणोत्सव मनाने जा रहे हैं। सुबह मंदिरों में जा कर निर्वाण लाडू चढाएंगे और यह प्रार्थना करेंगे कि लड्डू के कण-कण की मिठास जैसा मोक्षफल हमें भी प्राप्त हो और शाम को दीप जला कर यह प्रार्थना करेंगे कि भगवान महावीर के संदेश की ज्योति पूरे विश्व को आलोकित करते रहे। लेकिन क्या इतना भर पर्याप्त है और क्या यही हमारी दीपावली होनी चाहिए? भगवान महावीर आज से करीब ढाई हजार वर्ष पहले मोक्ष गए थे और उन्हें महावीर इसलिए नहीं कहा जाता कि उन्होंने कोई विश्व विजय प्राप्त की थी या कोई बड़ा साम्राज्य जीता था।

उन्हें महावीर इसलिए कहा जाता है कि उन्हें खुद को जीता था। संयम, त्याग और तप की ऐसी साधना की थी कि उन्होंने खुद पर विजय प्राप्त की थी। विश्व को जीतना आसान है, लेकिन खुद पर विजय पाना अत्यंत मुश्किल काम है और जो ऐसा कर पाते हैं, वे ही सच्चे अर्थ में महावीर बन पाते हैं। आप सोचिए कि चंचल मन और मस्तिष्क को नियंत्रण करना क्या आसान काम है? खुद की इंद्रियों को वश में रख पाना क्या हर किसी के बस की बात है? दिगम्बर वेश धारण कर पंच महाव्रतों का पालन करना क्या हर कोई कर सकता है?

यह आसान कतई नहंीं है और चूंकि महावीर यह कर पाए इसीलिए आज ढाई हजार वर्ष बाद भी वे उतने ही प्रासंगिक है, जितने उस समय थे, बल्कि कुछ अर्थों में तो उस समय से भी ज्यदा प्रासंगिक हैं। तीर्थंकर महावीर के दिए पांच महाव्रत सत्य, अंहिसा, अपरिग्रह, अस्तेय और ब्रह्म्चर्य की आज विश्व को सबसे ज्यादा आवश्यकता है। आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व यदि महावीर ने इनके बारे में बात की तो आप समझ सकते हैं कि वे कितने दूरदृष्टा थे। निश्चित रूप से उस समय का समय, काल और परिस्थितियां आज से भिन्न रही होंगी, लेकिन उनके दिए पांच सिद्धांतों की प्रासंगिकता आज भी बने रहना और ना सिर्फ बने रहना, बल्कि उनकी पहले से ज्यादा आवश्यकता अनुभव होना यह बताता है कि उन्हें तीर्थंकर यूं ही नहीं कहा जाता।

उन्होंने खुद पर विजय प्राप्त करने के बड़े लक्ष्य को तो प्राप्त किया ही साथ ही विश्व को भी इसी मार्ग पर चलने की राह बताई। अब आज महावीर तो नहंीं हैं, लेकिन उनकी शिक्षाएं और उपदेश हमारे साथ है और उनकी परम्परा को आगे बढ़ाने वाले हम जैन कुल के लोग विश्व में मौजूद हैं। जैन कुल में जन्म लेना परम सौभाग्य की बात है और इस कुल की परम्परा यह कहती है कि गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ना ही एक सच्चे जैन श्रावक की पहचान है।

हालांकि यह इतना आसान नहीं है और मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों में तो अत्यंत मुश्किल है, लेकिन एक जैन होने के नाते यह हमारा दायित्व है कि जो संदेश भगवान महावीर दे कर गए हैं, उसे अपन आचरण, व्यवहार और कार्यो से हम पूरे विश्व में पहुंचाएं। हम अपनी उस परपम्परा के सशक्त वाहक बनें तो भगवान महावीर ही नहीं बल्कि उनसे भी बहुत पहले भगवान आदिनाथ के समय से शुरू हुई थी।
इसीलिए इस दीपावली यह संकल्प करें कि भगवान महावीर ने अपने जीवन में जो कुछ प्राप्त किया था, उसका कुछ अंश धीरे-धीरे ही सही हम भी प्राप्त करने की कोशिश करेंगे और इस पंच दिवसीय दीपोत्सव को पंच महाव्रतों की ज्योति से आलोकित करेंगे।

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मनीष गोधा

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