सम्मेदशिखर जी। परमपूज्य परम तपस्वी अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महामुनिराज सम्मेदशिखर जी के स्वर्णभद्र कूट में विराजमान अपनी मौन साधना में रत होकर अपनी मौन वाणी से सभी भक्तों को प्रतिदिन एक संदेश में बताया कि पाँच चीजे इंसान की अपनी खुद की होती है
स्वभाव, भाग्य,चारित्र ,रूप और अच्छी बुरी सोच…।
म्हामुनिराज प्रसन्न सागर जी महाराज का कहना है कि जीवन की यात्रा में हम बेसुध होकर भागे जा रहे हैं। जब हम किसी यात्रा पर निकलते हैं तो समुचित संसाधनों की सुव्यवस्था कर के निकलते है, लेकिन जीवन यात्रा में ऐसा कुछ भी नहीं है।
जीवन का बहुत वक्त गुजरने के बाद होश आता है कि हम कहाँ भागे जा रहे है…?
ना लक्ष्य, न दिशा, ना मंजिल
सिर्फ मैं की दौड़ में भागे जा रहे हैं। कहीं दूसरा आगे निकल जाये … आज भागदौड़ की जिंदगी में, थोड़ा ठहराव, आत्म निरीक्षण, सही दिशा बोध होना बहुत जरूरी है। मन की उछाल को रोकना, इच्छाओं को वश में करना और अपनी अहमियत को याद रखना सबसे बड़ी समझदारी है। आज इंसान अपनी धुन में ही भागा जा रहा है। अपनी जीवनशैली में परिवर्तन को भी अवरोध समझ बैठा है। बस दौड़े जाओ, भागे जाओ, क्यांेकि ठहराव तो अंत है। ऐसा सोच कर चिंता ग्रस्त हो अपना सुख चैन ही स्वाहा करते जा रहा है। दरअसल मन की इक्छाओं को नियंत्रित करना बहुत जरूरी है। कुछ पल अपने लिए संजोना, स्वयं के भीतर झांकना, अपनी अनंत संभावनाओं को देखना, कुछ पल तनाव से मुक्त होकर जीना बहुत जरूरी है। दौड़ती भागती जिंदगी में ध्यान, सामयिक,पूजा-पाठ सत्संग अल्पविराम जैसा ही है। जीवन की दौड़ में अपनी शारीरिक मानसिक ऊर्जा का सही उपयोग करना ही समझदारी है।
संकलन कर्ता कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा, मनीष सेठी, विवेक गंगवाल कोलकता












