वीर शासन जयंती के अवसर पर भगवान महावीर स्वामी की प्रथम दिव्यध्वनि, जैन श्रुत परंपरा एवं अहिंसा के संदेश का स्मरण किया गया। आचार्य श्री 108 आदित्य सागर जी ने आत्मानुभूति और संयमपूर्ण जीवन अपनाने का आह्वान किया। पढ़िए श्रीफल साथी पदम जैन बिलाला की यह रिपोर्ट।
जयपुर। 30 जुलाई 2026 को वीर शासन जयंती के पावन अवसर पर भगवान महावीर स्वामी की सर्वभाषामयी प्रथम दिव्यध्वनि का स्मरण श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया। जैन परंपरा के अनुसार श्रावण कृष्ण प्रतिपदा के दिन राजगृही के विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर की प्रथम दिव्यध्वनि प्रकट हुई, जिससे जिनशासन के व्यापक प्रचार-प्रसार का शुभारंभ हुआ।

दिव्यध्वनि का ऐतिहासिक महत्व
जैन मान्यता के अनुसार भगवान महावीर की दिव्यध्वनि 718 भाषारूपों में प्रकट हुई, जिसमें 18 महाभाषाएँ तथा 700 लघु भाषाएँ सम्मिलित थीं। यह दिव्यध्वनि प्रत्येक संज्ञी जीव को उसकी भाषा के अनुरूप धर्म का बोध कराती थी। इसी दिव्य देशना से जैन धर्म की श्रुत परंपरा का विस्तार प्रारंभ हुआ।
गौतम गणधर से प्रारंभ हुई श्रुत परंपरा
भगवान महावीर की प्रथम देशना को उनके प्रथम गणधर इंद्रभूति गौतम (गौतम स्वामी) ने श्रुतज्ञान के रूप में ग्रहण किया। परंपरा के अनुसार उन्होंने द्वादशांग एवं चौदह पूर्वों का संकलन किया, जो आगे चलकर जैन आगम परंपरा का आधार बने।
आत्मकल्याण का संदेश
भगवान महावीर ने अपनी देशना में आत्मा के शुद्ध स्वरूप की अनुभूति, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह जैसे महाव्रतों के पालन का उपदेश दिया। उन्होंने अनेकांतवाद तथा सम्यक दर्शन के माध्यम से आत्ममुक्ति का मार्ग बताया।
आचार्य आदित्य सागर जी का संदेश
जनकपुरी ज्योतिनगर में विराजमान आचार्य श्री 108 आदित्य सागर जी ने अपने संदेश में कहा कि वीर शासन जयंती केवल ऐतिहासिक दिवस नहीं, बल्कि आत्मजागरण का पर्व है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से भगवान महावीर की दिव्य देशना को जीवन में उतारने, भेदविज्ञान का अभ्यास करने तथा अहिंसा, सत्य, संयम और अपरिग्रह के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
आध्यात्मिक प्रेरणा
वीर शासन जयंती जैन समाज को यह प्रेरणा देती है कि भगवान महावीर के सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने हजारों वर्ष पूर्व थे। उनकी दिव्यध्वनि समस्त मानवता के लिए शांति, करुणा, आत्मसंयम और मोक्षमार्ग का अमूल्य संदेश प्रदान करती है।













Add Comment