समाचार

चातुर्मास 29 जुलाई से, संयम और संस्कारों से जुड़ेगा समाज : चार माह तक एक ही स्थान पर रहकर जनजागरण करेंगे जैन साधु-साध्वी


29 जुलाई से प्रारंभ होने वाला चातुर्मास जैन धर्म का प्रमुख साधना काल है। चार माह तक साधु-साध्वियाँ एक स्थान पर रहकर धर्म, संयम, तप एवं संस्कारों का संदेश देंगे। पढ़िए श्रीफल साथी संपादकीय डेस्क की यह रिपोर्ट।


नई दिल्ली। जैन धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधना काल चातुर्मास इस वर्ष 29 जुलाई 2026 से प्रारंभ होगा। वर्षा ऋतु के चार महीनों में जैन साधु-साध्वियाँ एक ही स्थान पर निवास कर आत्मसाधना, स्वाध्याय, तप, त्याग, प्रवचन एवं धर्मप्रभावना के माध्यम से समाज में संयम, सदाचार, अहिंसा और नैतिक जीवन का संदेश देंगे। इस अवधि में देशभर के जैन मंदिरों, स्थानकों एवं उपाश्रयों में धार्मिक, आध्यात्मिक और संस्कारमूलक कार्यक्रमों का आयोजन होगा।

आगमिक परंपरा का पालन

श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने बताया कि जैन आगमों के अनुसार वर्षा ऋतु में असंख्य सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती है। अहिंसा की भावना को सर्वोच्च मानते हुए जैन साधु-साध्वियाँ इस काल में विहार नहीं करते, बल्कि एक ही स्थान पर निवास करते हैं। आगमिक व्यवस्था के अनुसार वे चातुर्मास के दौरान निर्धारित सीमा से बाहर नहीं जाते। इस वर्ष पक्खी पर्व होने के कारण चातुर्मास का शुभारंभ 29 जुलाई से होगा।

आत्मजागरण का विशेष अभियान

उन्होंने कहा कि चातुर्मास केवल संतों के स्थिर निवास का समय नहीं, बल्कि समाज के आध्यात्मिक जागरण का चार माह का महाअभियान है। इस दौरान प्रवचन, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, जप, तप, ध्यान, आयंबिल, उपवास, एकासन, पौषध, नवकारसी एवं अन्य धार्मिक आराधनाएँ कराई जाती हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु त्याग, व्रत एवं आत्मसंयम का संकल्प लेकर अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं।

वर्तमान समय में बढ़ा महत्व

श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने कहा कि आज का समाज तनाव, प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और मानसिक अशांति जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में चातुर्मास व्यक्ति को संयम, आत्मनिरीक्षण, अनुशासन, सादगी, जीवदया, पर्यावरण संरक्षण, नैतिकता और पारिवारिक संस्कारों से जोड़ने का सशक्त माध्यम है। यह पर्व आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

सात्विक जीवनशैली का संदेश

चातुर्मास के दौरान सात्विक एवं संयमित भोजन पर विशेष बल दिया जाता है। श्रद्धालु जमीकंद, गरिष्ठ भोजन तथा अनेक तिथियों पर हरी सब्जियों एवं फलों का भी त्याग करते हैं। आयंबिल, उपवास, एकासन, पौषध, सामायिक एवं प्रतिक्रमण जैसी आराधनाओं के माध्यम से आत्मसंयम का अभ्यास किया जाता है।

चातुर्मास के प्रमुख पर्व

चातुर्मास के दौरान अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व मनाए जाएंगे—

– 29 जुलाई – चातुर्मास प्रारंभ

– 8 सितंबर – पर्यूषण महापर्व प्रारंभ (श्वेतांबर)

– 15 सितंबर – संवत्सरी महापर्व एवं दशलक्षण पर्व प्रारंभ (दिगंबर)

– 25 सितंबर – अनंत चतुर्दशी

– 18 अक्टूबर – नवपद आयंबिल ओली प्रारंभ

– 9 नवंबर – भगवान महावीर का 2553वाँ निर्वाण कल्याणक

– 10 नवंबर – गौतम प्रतिपदा एवं वीर निर्वाण संवत् 2553 का शुभारंभ

– 14 नवंबर – ज्ञान पंचमी

– 24 नवंबर – चातुर्मास पूर्णाहुति

इसके अतिरिक्त संतों की जन्म जयंती, पुण्यतिथि, धार्मिक संगोष्ठियाँ, संस्कार शिविर, युवा एवं महिला सम्मेलन तथा सामूहिक आराधनाओं का भी आयोजन होगा।

देशभर में 19 हजार से अधिक साधु-साध्वियाँ

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ की वर्ष 2026 की सूची के अनुसार इस वर्ष संघ में 362 चातुर्मास निर्धारित किए गए हैं। वर्तमान में संघ में 214 साधु एवं 961 साध्वियाँ धर्मप्रभावना में सक्रिय हैं। वहीं देश की चारों प्रमुख जैन परंपराओं—स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, तेरापंथ एवं दिगंबर—को मिलाकर लगभग 19 हजार से अधिक साधु-साध्वियाँ धर्म, शिक्षा, संस्कार, अहिंसा और सामाजिक जागरण का कार्य कर रहे हैं।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shree Phal News

About the author

Shree Phal News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page