अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने इष्टोपदेश ग्रंथ के आधार पर पाप, पुण्य और मोक्ष की विस्तृत व्याख्या करते हुए सम्यक दर्शन, व्रत, शुभ भाव और आत्मविशुद्धि को मोक्षमार्ग का आधार बताया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।
सागवाड़ा। पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में स्वाध्याय तपस्वी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने इष्टोपदेश ग्रंथ के आधार पर पाप, पुण्य और मोक्ष की गहन व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि परम वीतराग अवस्था की प्राप्ति के लिए जीव को अशुभ भावों का त्याग कर आत्मविशुद्धि की ओर अग्रसर होना आवश्यक है
इष्टोपदेश ग्रंथ से समझाया मोक्षमार्ग
गुरुदेव ने कहा कि सभी धर्मों में पाप, पुण्य और मोक्ष का वर्णन मिलता है। पाप अव्रत से उत्पन्न होता है, जबकि सम्यक दर्शन से युक्त व्रत ही वास्तविक पुण्य का कारण बनता है। मोक्ष वह अवस्था है, जहाँ जीव पुण्य और पाप दोनों से परे होकर मोह का पूर्ण क्षय कर लेता है।
सम्यक दर्शन से प्रारंभ होता है वास्तविक पुण्य
उन्होंने कहा कि अनादि काल से जीव मिथ्यादृष्टि में रहा है। वास्तविक पुण्य का आरंभ सम्यक दर्शन के बाद ही होता है। चाहे जीव मनुष्य हो, पशु, चांडाल अथवा नारकी—सम्यक दृष्टि के बिना व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। माया, मिथ्यात्व और निदान से युक्त उपवास को वास्तविक व्रत नहीं माना जा सकता।
उदाहरणों से समझाया शुभ-अशुभ का अंतर
कनक नंदी गुरुदेव ने कहा कि जैसे धूप में खड़े पथिक के लिए छाया राहत का माध्यम बनती है, वैसे ही व्रत और धर्म जीव को संसार के ताप से बचाते हैं। उन्होंने प्रातःकालीन लालिमा का उदाहरण देते हुए बताया कि अशुभ भावों के समाप्त होते ही आत्मा में ज्ञानरूपी सूर्य का उदय होता है।
आसक्ति और फैशन को बताया बाधक
गुरुदेव ने कहा कि फैशन, व्यसन, धन, परिवार और भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति आत्मोन्नति में बाधक है। देव, शास्त्र और गुरु के प्रति श्रद्धा जीव के उत्थान का कारण बनती है, जबकि दूसरों का उपहास और राग-द्वेष आत्मिक पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
आत्मविशुद्धि ही धर्म का मूल संदेश
उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मा की विशुद्धि है। जब जीव शुभ भावों का अभ्यास करता है और माया, क्रोध, मान एवं लोभ का त्याग करता है, तभी मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है। वेबीनार की जानकारी श्रीमती विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा ने दी।













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