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चातुर्मास में निःशुल्क भोजन व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता : सहयोग आधारित कैंटीन व्यवस्था को बताया समयानुकूल और व्यावहारिक मॉडल


आगरा के समाजसेवी मनोज कुमार जैन बाकलीवाल ने चातुर्मास के दौरान भोजन व्यवस्था को लेकर विचार प्रस्तुत करते हुए सामान्य आगंतुकों के लिए सहयोग आधारित कैंटीन व्यवस्था का सुझाव दिया। उन्होंने इसे सेवा, आत्मनिर्भरता और आर्थिक संतुलन का बेहतर विकल्प बताया। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।


मुरैना/आगरा। चातुर्मास के दौरान देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन के बीच भोजन एवं आवास जैसी व्यवस्थाओं को लेकर आगरा के वरिष्ठ समाजसेवी, उद्यमी एवं मंच संचालक मनोज कुमार जैन बाकलीवाल ने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए हैं। उनका मानना है कि बदलते समय में व्यवस्थाओं को अधिक टिकाऊ और व्यावहारिक बनाने पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

निःशुल्क व्यवस्था के स्थान पर सहयोग आधारित मॉडल

मनोज बाकलीवाल ने कहा कि वर्षों से चातुर्मास में सभी आगंतुकों के लिए निःशुल्क भोजन एवं जलपान की परंपरा रही है, जो सेवा और अतिथि सत्कार की भावना से प्रेरित है। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में सामान्य आगंतुकों के लिए नाममात्र के सहयोग शुल्क के साथ कैंटीन व्यवस्था अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इससे किसी पर आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ेगा और व्यवस्थाओं के संचालन में सहयोग मिलेगा।

आचार्य विद्यासागर जी के दृष्टिकोण का उल्लेख

उन्होंने कहा कि समाधिस्थ आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के अनेक चातुर्मासों में भोजन के लिए प्रतीकात्मक शुल्क लिया जाता था, जिसे श्रद्धालु सहर्ष स्वीकार करते थे। इसी प्रकार धर्मशालाओं में भी नाममात्र का शुल्क लेकर व्यवस्थाओं का संचालन किया जाता था, जबकि विशेष सुविधाओं के लिए अलग व्यवस्था रहती थी। इससे संसाधनों का सदुपयोग और व्यवस्थाओं का संतुलन बना रहता था।

जरूरतमंदों के लिए निःशुल्क व्यवस्था जारी रहे

मनोज बाकलीवाल ने स्पष्ट किया कि उनका सुझाव सेवा भावना को कम करने के उद्देश्य से नहीं है। ब्रह्मचारियों, स्वयंसेवकों एवं आर्थिक रूप से असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क भोजन और आवास की व्यवस्था पूर्ववत जारी रहनी चाहिए। सामान्य आगंतुकों से केवल प्रतीकात्मक सहयोग राशि लेने पर विचार किया जा सकता है।

समाज में व्यापक संवाद की आवश्यकता

उन्होंने कहा कि आज चातुर्मास का स्वरूप अधिक व्यापक और खर्चीला होता जा रहा है। ऐसे में सेवा, आत्मनिर्भरता और आर्थिक संतुलन को साथ लेकर चलने वाली व्यवस्थाओं की आवश्यकता है। समाज को इस विषय पर खुले मन से विचार-विमर्श करना चाहिए ताकि भविष्य के चातुर्मास अधिक सुव्यवस्थित और दीर्घकाल तक टिकाऊ बन सकें।

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