श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने धर्मस्थलों में प्राप्त धन को समाज की श्रद्धा की अमानत बताते हुए उसके पारदर्शी और धर्मसम्मत उपयोग पर बल दिया। उन्होंने भगवान महावीर के अपरिग्रह सिद्धांत को आज के समय की आवश्यकता बताया। पढ़िए श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र का आलेख
विशेष। श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि धर्मस्थलों में प्राप्त होने वाला धन केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि समाज की आस्था, विश्वास और समर्पण की अमानत है। इसका उपयोग सदैव धर्म, समाज और जनकल्याण के उद्देश्य से ही होना चाहिए।
धर्मस्थल समाज की आस्था के केंद्र
उन्होंने कहा कि मंदिर, तीर्थ, स्थानक और उपाश्रय केवल धार्मिक भवन नहीं हैं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा, तप, त्याग और विश्वास के प्रतीक हैं। श्रद्धालु जब दान देता है, तो वह केवल धन नहीं, बल्कि अपनी आस्था और विश्वास भी समर्पित करता है।
धर्म के धन का दुरुपयोग आस्था पर आघात
श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने कहा कि यदि धर्म के नाम पर प्राप्त धन का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ, वैभव या प्रतिष्ठा के लिए किया जाता है, तो यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं बल्कि समाज की आस्था पर गंभीर आघात है। धर्म का धन सदैव धर्महित और समाजहित में ही उपयोग होना चाहिए।
भगवान महावीर के अपरिग्रह सिद्धांत का महत्व
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर का अपरिग्रह सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। अपरिग्रह केवल वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि लोभ, स्वार्थ और अधिकार के दुरुपयोग से स्वयं को मुक्त करना है। धर्म का उद्देश्य सेवा, समर्पण और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है
पारदर्शिता से बढ़ता है विश्वास
उन्होंने धर्मस्थलों के संचालन में पारदर्शिता, ईमानदारी और जवाबदेही को आवश्यक बताते हुए कहा कि आय-व्यय का स्पष्ट लेखा-जोखा समाज के विश्वास को मजबूत करता है। किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान संयम, संवाद और धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप होना चाहिए।
समाज के नाम संदेश
श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने कहा कि व्यक्ति से बड़ा धर्म, पद से बड़ी मर्यादा और संस्था से बड़ी आस्था होती है। धर्म की पवित्रता और समाज के विश्वास की रक्षा करना प्रत्येक श्रद्धालु, पदाधिकारी और संस्था का नैतिक दायित्व है। जब धर्म शुद्ध रहेगा, तभी समाज सुदृढ़ और संस्कृति सुरक्षित रहेगी।













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