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मुरैना के जैन मंदिरों से 580 दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां हुई पंजीकृत : ज्ञान भारतम् मिशन के तहत सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण को मिली नई गति


ज्ञान भारतम् मिशन के अंतर्गत मुरैना के बड़ा जैन मंदिर एवं जैन संस्कृत विद्यालय से 580 दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों का पंजीयन किया गया है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।


मुरैना। भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण, संवर्धन, अभिलेखीकरण एवं डिजिटलीकरण के उद्देश्य से संचालित ज्ञान भारतम् मिशन के अंतर्गत मुरैना जिले में महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। जिले के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर एवं श्री गोपालदास दिगंबर जैन संस्कृत विद्यालय से 580 दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों का सफलतापूर्वक पंजीयन किया गया है।

17वीं से 20वीं शताब्दी की अमूल्य धरोहर

पंजीकृत की गई पांडुलिपियां संस्कृत, प्राकृत एवं हिंदी भाषाओं में लिखी गई हैं। ये दुर्लभ ग्रंथ 17वीं से 20वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य के बताए जाते हैं, जो भारतीय धार्मिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

ज्ञान भारतम् मिशन के तहत हुआ कार्य

भारत सरकार द्वारा संचालित ज्ञान भारतम् मिशन का उद्देश्य देश की प्राचीन ज्ञान-संपदा का संरक्षण, दस्तावेजीकरण एवं डिजिटलीकरण करना है। इसी अभियान के तहत मुरैना में भी पांडुलिपियों के पंजीयन एवं परीक्षण का कार्य किया गया।

विशेषज्ञों ने किया दस्तावेजीकरण

मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत कमलेश कुमार भार्गव के मार्गदर्शन में पुरातत्व विभाग के अशोक शर्मा एवं पुरातत्वविद् डॉ. नवनीत कुमार जैन द्वारा पांडुलिपियों के पंजीयन, परीक्षण एवं दस्तावेजीकरण का कार्य संपन्न किया गया।

ज्ञान और इतिहास की अमूल्य निधि

डॉ. नवनीत कुमार जैन ने बताया कि ये हस्तलिखित पांडुलिपियां भारतीय एवं जैन ज्ञान परंपरा, धार्मिक इतिहास, लेखन कला और सांस्कृतिक विकास की महत्वपूर्ण साक्षी हैं। इनमें निहित सामग्री तत्कालीन समाज, धर्म, दर्शन, साहित्य एवं ज्ञान-विज्ञान से जुड़ी बहुमूल्य जानकारी प्रदान करती है।

डिजिटलीकरण से बढ़ेंगे शोध के अवसर

ज्ञान भारतम् मिशन के माध्यम से इन पांडुलिपियों का डिजिटल अभिलेखीकरण किया जा रहा है, जिससे देश की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रहेगी और शोधार्थियों एवं विद्वानों को अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। यह पहल भारत की ज्ञान-संपदा को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में भी सहायक सिद्ध होगी।

विद्यालय परिवार का मिला सहयोग

इस महत्वपूर्ण कार्य में श्री गोपालदास दिगंबर जैन संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य चक्रेश कुमार जैन शास्त्री सहित विद्यालय परिवार एवं पदाधिकारियों का उल्लेखनीय सहयोग रहा। समाजजनों ने इसे जैन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।

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