भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनकनंदीजी ने बताया कि जो भी सुख-दुख जन्म मरण है, इसका मूल कारण कर्म है। राग, द्वेष, मोह आदि से कर्म बंध होता ही है। भूत-प्रेत आदि पाप के कारण है। बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट…
बांसवाड़ा। भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनकनंदीजी ने बताया कि जो भी सुख-दुख जन्म मरण है, इसका मूल कारण कर्म है। राग, द्वेष, मोह आदि से कर्म बंध होता ही है। भूत-प्रेत आदि पाप के कारण है। हम बाजार से नहीं बल्कि गुठली से अंकुर, अंकुर से वृक्ष, वृक्ष से आम ऋतु के अनुसार ही प्राप्त होता है। वैसे ही हर कार्य का कारण सुख-दुख का कारण कर्म है। ग्रह दोष दूर करने के लिए मुख्य रूप से दान दिया जाता है, पूजा की जाती है। हिक्टोरिया रोग अविवाहित महिलाओं को होता है संतान उत्पन्न होने के बाद यह रोग नहीं होता। कर्म उदय से अनेक रोग होते हैं, अतः मन पवित्र करो दान करो पूजा करो। भाव पाप राग द्वेष, मोह, क्रोध मान, मायाचारी समस्त सांसारिक दुखों का कारण है। यहां पर आचार्य श्री कहते हैं कि हे धीर, वीर तू ज्ञान रूपी सूर्य आत्मा का आश्रय ले क्योंकि, उसको प्राप्त करके राग रूपी नदी सूख जाती है। सभी धार्मिक क्रियाओं का मूल कारण भाव शुद्ध करना है। भाव अच्छे किए बिना धर्म करना अर्थात बिना बीज बोए फल की चाह रखना है। पापी जीव भूत होते हैं। अतः आचार्य श्री ने राग, द्वेष करने वालों को मोह करने वाले को आत्मा को नहीं जानने वाली को महा पिशाच कहां है। एआई भी बता रहा है कि वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न व्यक्ति ही धर्म को सही समझते हैं। जहां राग है, वहां द्वेष अवश्य होगा। वहां पर मोह तथा आसक्ति भी होगी ही। भोजन के प्रति राग है वहां निश्चित रूप से द्वेष होगा ही।
जहां लोभ होगा वहां पर सभी पाप होंगे
घड़ियाल एनाकोंडा क्रोकोडाइल आदि शिकार करते समय चुपचाप रहते हैं हिलते-ढूंढते तक नहीं है परंतु, उनमें द्वेष अवश्य रहता है शिकार को पकड़ने के लिए वह टकटकी लगाए बैठे रहते हैं। पेड़ भी क्रोध करता है तथा सभी कषाएं उसमें तीव्र उदय में रहती है यह गुरुदेव के पास पढ़ने से पहले हम सभी नहीं जानते थे। क्रोध से भी लोभ करने वाला महा पापी है। जहां लोभ होगा वहां पर सभी पाप होंगे ही लोभ के कारण ही जीव हिंसा करता है झूठ बोलता है चोरी करता है अन्याय,अत्याचार करता है परिग्रह इकट्ठा करता है। लोभ के कारण धन कमाने वालों को परिवार के लोग श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि सब धन ही चाहते हैं। लोभी को क्रोधी से सामान्य लोग कम पापी मानते हैं। वर्तमान में तथा प्राचीन काल में सभी युद्ध लोभ के कारण हुए हैं।
संकल्प विकल्प से रहित होकर मन स्थिर होता है
साधु जितने अंश में निर्लाेभी, वितरागी होंगे उतने अंश में उनका मन स्थिर होगा ध्यान कर सकेंगे आत्मा का आनंद प्राप्त कर सकेंगे। संपूर्ण ज्ञान साम्राज्य प्राप्त करने के लिए मोह को क्षय करना राग द्वेष क्रोध मान माया काम सबको नष्ट करना पड़ेगा। आत्मा विजयी ही विश्व विजई बनता है। जो समता रूपी शस्त्र से, ध्यान रूपी अस्त्रों से कर्म रूपी शत्रुओं का हनन करते हैं वह अरिहंत होते हैं। अरिहंतों ने राग द्वेष मोह लोभ आदि अंतरंग शत्रु को जीत लिया है। यहां पर आचार्य ने उदाहरण से समझाया है कि मन रूपी पक्षी राग द्वेष रूपी पंखों के कट जाने से उड़ नहीं सकता, वैसे ही राग द्वेष नष्ट हो जाने से संकल्प विकल्प से रहित होकर मन स्थिर होता है। मन को हीरे या सोने की जंजीर से नहीं बाध सकते जब राग द्वेष क्षीण करोगे तब मन को संयमित कर सकोगे। धन जड़ है अपरिग्रह धारी साधु के सामने स्वर्ग के इंद्र चक्रवर्ती राजा आदि भी झुकते हैं।
मुनि श्री सुविज्ञसागर जी का केशलोच
मुनि श्री सुविज्ञसागर जी का कल केशलोच सादगी पूर्ण तरीके से आचार्य श्री की उपस्थिति तथा श्री संघ की उपस्थिति मे एकांत में हुआ। मुनि श्री ने आचार्य श्री की कविता- ‘कहां भी नहीं यहां ही सही है सुख दुख वह जन्म मरण। स्वर्ग भी तू ही नर्क भी तू ही बंध भी तू ही मोक्ष भी तू ही।’ से मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा ने दी।













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