अनादिकाल से ही जैन मुनि एवं आर्यिकाएं मूलाचार का पालन करते हुए पैदल विहार करती आ रही हैं। वे कभी वाहन का उपयोग नहीं करते, न ही चप्पल पहनते हैं। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की सर्दी, वे सदैव पैदल ही विहार करते हैं। मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, अंशुल जैन शास्त्री की कलम से यह आलेख, इसे प्रस्तुत किया है मनोज जैन नायक ने…
मुरैना/सांगानेर। अनादिकाल से ही जैन मुनि एवं आर्यिकाएं मूलाचार का पालन करते हुए पैदल विहार करती आ रही हैं। वे कभी वाहन का उपयोग नहीं करते, न ही चप्पल पहनते हैं। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की सर्दी, वे सदैव पैदल ही विहार करते हैं। उनके पास न धन होता है, न वाहन और न ही वे किसी से किसी प्रकार की अपेक्षा रखते हैं। दिन में केवल एक समय भोजन करते हैं, वह भी अत्यंत साधना और मर्यादा के साथ परंतु, आज सबसे बड़ी चिंता का विषय जैन मुनि एवं आर्यिकाओं की विहार के दौरान असुरक्षित हो चुके हैं । पिछले कुछ वर्षों में सड़क दुर्घटनाओं में 20 से अधिक दुखद घटनाएं सामने आ चुकी हैं। लगभग हर महीने कहीं न कहीं विहार कर रहे संतों के साथ दुर्घटना की खबर सुनने को मिलती है। हाल ही में दो जैन आर्यिकाओं की वाहन दुर्घटना में मृत्यु ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। प्रश्न यह है कि आखिर कब तक तप, त्याग और अहिंसा का संदेश देने वाले संत सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होते रहेंगे? क्या उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है?
भारत सरकार एवं राज्य सरकारों से समाज की विनम्र मांग है कि जैन मुनि-आर्यिकाओं के विहार मार्गों पर विशेष सुरक्षा व्यवस्था की जाए, वाहन चालकों को संवेदनशील बनाने के लिए अभियान चलाए जाएं तथा आवश्यक स्थानों पर सुरक्षा संकेतक एवं पुलिस सहयोग उपलब्ध कराया जाए। यह केवल जैन समाज का नहीं, बल्कि देश की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा का विषय है।













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