बागीदौरा नगर से विहार करते हुए नगर में गाजे-बाजों के साथ आर्यिका सिद्धमति माताजी का मंगल प्रवेश हुआ। समाजजनों ने माताजी की भव्य अगवानी कर आशीर्वाद लिया। उनके सानिध्य में वागड़ के बड़े बाबा आदिनाथ भगवान की शांतिधारा और अभिषेक किया गया। नौगामा से पढ़िए, सुरेशचंद्र गांधी की यह रिपोर्ट…
नौगामा। बागीदौरा नगर से विहार करते हुए नगर में गाजे-बाजों के साथ आर्यिका सिद्धमति माताजी का मंगल प्रवेश हुआ। समाजजनों ने माताजी की भव्य अगवानी कर आशीर्वाद लिया। उनके सानिध्य में वागड़ के बड़े बाबा आदिनाथ भगवान की शांतिधारा और अभिषेक किया गया। इस अवसर पर मंगल प्रवचन में माताजी ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार संस्कार बाहरी प्रदर्शन की वस्तु नहीं, बल्कि आत्मा को विकारों से मुक्त कर उसे उसके मूल, शुद्ध स्वभाव में लाने की एक पवित्र आंतरिक प्रक्रिया है। वास्तविक संस्कार जीवन में क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को मंदकर भीतर समता भाव, विवेक, विनय और शील जैसे शाश्वत नैतिक मूल्यों को जाग्रत करते हैं। सुसंस्कृत जीवन जीने से न केवल नए पाप कर्मों का आस्रव रुकता है, बल्कि पूर्व संचित कर्मों की निर्जरा का मार्ग भी प्रशस्त होता है, जिसमें अहिंसक आहार, इंद्रिय संयम, स्वाध्याय और संतों की संगति मुख्य आधार बनते हैं।
बालक के जीवन में संस्कारों का बीजारोपण परिवार और गुरुओं के आचरण से होता है, जो उसे भौतिक चकाचौंध से हटाकर भोग के स्थान पर त्याग, करुणा और श्जियो और जीने दोश् की भावना सिखाता है। संक्षेप में संस्कारों की यही पराकाष्ठा आत्मा को परमात्मा (सिद्ध स्वरूप) बनाने में सहायक होती है और यही सुसंस्कृत जीवन मोक्ष मार्ग का प्रथम सोपान है। शाम को माताजी के सानिध्य में आचार्य भक्ति के की गई।













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