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णमोकार मंत्र आत्मशुद्धि विनय, ज्ञान मोक्ष मार्ग की देता है प्रेरणा : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में हुआ संस्कार शिविर का शुभारंभ


आचार्य श्री ने चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी के संस्कार शिविर 21 से 30 मई के शुभारंभ पाठशाला में बताया कि णमोकार महामंत्र में जब श्रद्धा, विश्वास और संयम जुड़ जाते हैं, तब कठिन से कठिन मार्ग भी सरल हो जाते हैं। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


जयपुर। आचार्य श्री ने चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी के संस्कार शिविर 21 से 30 मई के शुभारंभ पाठशाला में बताया कि णमोकार महामंत्र में जब श्रद्धा, विश्वास और संयम जुड़ जाते हैं, तब कठिन से कठिन मार्ग भी सरल हो जाते हैं। दूर-दूर तक की यात्राएँ, कठिन रास्ते, बाधाएँ, फिर भी मंत्र और श्रद्धा के प्रभाव से सब पार हो जाते है यही मंत्रसार की वास्तविक शक्ति है नमोकार मंत्र किसी व्यक्ति-विशेष की स्तुति नहीं है।यह गुणों की आराधना है।अरिहंत जिन्होंने कषाय जीते सिद्ध पूर्ण मुक्त आत्माएँ आचार्य धर्मसंघ के नेता उपाध्याय ,ज्ञानदाता, साधु साधना में स्थित महात्मा है इसलिए यह मंत्र हमें भी आत्मशुद्धि, विनय, ज्ञान और मोक्षमार्ग की प्रेरणा देता है।“ जो श्रद्धा, विनय और शुद्ध भाव से नमोकार मंत्र का जाप करता है,उसके भीतर के विकार शांत होने लगते हैं। यह अत्यंत गूढ़ और व्यवहारिक उपदेश है कि नमोकार मंत्र केवल बोलने का विषय नहीं, बल्कि निरंतर स्मरण और ध्यान का विषय है। किसी भी परिस्थिति में मन में पंच-नमस्कार मंत्र का ध्यान बना रहना चाहिए। सुरेश सबलावत, भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने आगे कहा कि शास्त्रों में जप के स्थानों का भी वर्णन मिलता है। घर में जप ,सामान्य फल,वन या एकांत स्थान में सौ गुणा फल,देवालय में करोड़ गुना फल भगवान के समक्ष अनंत गुणा फल एकाग्रता और पवित्र भाव की महिमा से प्राप्त होता है। इसलिए जहाँ मन स्थिर हो सके,वही स्थान साधना के लिए श्रेष्ठ है। णमोकार मंत्र केवल कर्म-निर्जरा का साधन नहीं,बल्कि मानसिक शांति का भी साधन है। आचार्य श्री ने खानपान, आचार विचार के गुण दोष बताए। धर्म का प्रवेश तब होता है। जब जीवन में संयम और जागरूकता आती है। जिसके मन में निरंतर नमोकार का स्मरण रहता है,उसका जीवन धीरे-धीरे भीतर से पवित्र होने लगता हैं।

आर्यिका श्री महायश मति जी ने केश लोचन किए

अनेक श्रद्धालुओं के सामने श्री वर्धमान सागर जी की सुशिष्या आर्यिका श्री महायश मति ने गुरुवार को केशलोचन किया। केशलोचन के बारे में संघ की आर्यिका श्री पूर्णिमा मति जी ने चर्चा में बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 माह से 4 माह की अवधि के भीतर के केशलोचन करना अनिवार्य है। केशलोच दिगंबर साधु का मूल गुण है। केशलोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है। जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है बालों का लोचन अगर नहीं किए जाएं तो उसमें छोटे-छोटे जीवों की उत्पत्ति होने की संभावना होती है जैन साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती होते हैं। सुनीता भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार माताजी ने बताया कि जैन साधु अपरिग्रही होते हैं। इसलिए जैन साधु अपने हाथ से केशलोचन करते हैं केश लोच से शरीर से ममत्व दूर होता है। केश लोचन के समय तप, संयम, धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना होती है। जिस दिन जैन साधु केशलोच करते हैं उस दिन उपवास करते हैं।

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