रीवा में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से दीक्षित आर्यिका 105 श्री श्रुतमति माताजी की सड़क दुर्घटना में समाधि हो गई। घटना के बाद जैन समाज में शोक और श्रमण सुरक्षा को लेकर चिंता का माहौल है। संपादक रेखा संजय जैन की रिपोर्ट
रीवा ।।मध्यप्रदेश के रीवा जिले से जैन समाज को झकझोर देने वाली बेहद दुखद खबर सामने आई है। आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज से दीक्षित आर्यिका 105 श्री श्रुतमति माताजी की आज सुबह सड़क दुर्घटना में समाधि हो गई। इस घटना ने पूरे समाज को गहरे शोक में डुबो दिया है।
दैनिक क्रिया के दौरान हुआ दर्दनाक हादसा
जानकारी के अनुसार माताजी संघ के साथ विहाररत थीं। सुबह दैनिक आवश्यक क्रिया हेतु जंगल की ओर जाते समय तेज रफ्तार बड़े वाहन ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। हादसा इतना भयावह था कि आर्यिका श्री श्रुतमति माताजी की घटनास्थल पर ही समाधि हो गई।

इस दुर्घटना में उपशममति माताजी गंभीर रूप से घायल बताई जा रही हैं, जबकि संघ की दो अन्य माताजी बाल-बाल बच गईं।
विद्या और साधना का अद्भुत संगम थीं माताजी
आर्यिका श्री श्रुतमति माताजी वर्तमान में आर्यिका 105 सौम्यमति माताजी के संघ में विराजमान थीं। उन्हें 13 फरवरी 2006 को सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के करकमलों से आर्यिका दीक्षा प्राप्त हुई थी।
इससे पहले वर्ष 1998 में भाग्योदय तीर्थ सागर में उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया था।
माताजी उच्च शिक्षित थीं। उन्होंने मानव शास्त्र में एमएससी और संस्कृत में एमए की शिक्षा प्राप्त की थी। गृहस्थ अवस्था में उनका परिवार सागर नगर के रामपुरा वार्ड से जुड़ा रहा। उनके बड़े भाई वर्तमान में आचार्य संघ के मुनि श्री 108 अचलसागर महाराज हैं।
श्रमण सुरक्षा को लेकर फिर बढ़ी चिंता
इस हृदयविदारक घटना ने एक बार फिर श्रमण संस्कृति की सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। लगातार विहाररत संतों और आर्यिकाओं की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर समाज में चिंता और आक्रोश दोनों दिखाई दे रहे हैं।
समाजजनों का कहना है कि विहार और दैनिक आवश्यक क्रियाओं के समय संत-संघ के साथ पर्याप्त संख्या में सहयोगियों की व्यवस्था होना बेहद जरूरी है, ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
समाज ने बताया संस्कृति पर आघात
समाज के लोगों का कहना है कि ऐसी घटनाएं केवल सड़क दुर्घटनाएं नहीं होतीं, बल्कि पूरी श्रमण संस्कृति को पीड़ा पहुंचाने वाले गहरे आघात होती हैं। अब समय आ गया है कि संत-संघों की सुरक्षा को लेकर ठोस और व्यवस्थित कदम उठाए जाएं।













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