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जब इंसान अपने अहंकार और इच्छाओं का होता है शिकार : आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी ने समझाया ड्रिपेशन से किस प्रकार बचना चाहिए 


आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी ससंघ परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान में विराजमान हैं। उनके सानिध्य में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम हो रहे हैं। सोमवार को गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मानव जीवन में अहंकार और इच्छा ऐसे मादक तत्व हैं, जो व्यक्ति को किसी भी प्रकार के नशे की लत की ओर धकेल सकते हैं। परतापुर से पढ़िए, नरेंद्र अजमेरा और पियूष कासलीवाल की यह खबर…


परतापुर। आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी ससंघ परतापुर/बांसवाड़ा में विराजमान हैं। उनके सानिध्य में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम हो रहे हैं। सोमवार को गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मानव जीवन में अहंकार और इच्छा ऐसे मादक तत्व हैं, जो व्यक्ति को किसी भी प्रकार के नशे की लत की ओर धकेल सकते हैं। दुनिया में नशा करने वाले कितने लोग हैं, यह जानना मानो रेत से तेल निकालने जैसा कठिन है। नशा भी दो प्रकार का होता है-एक अच्छा नशा और एक बुरा नशा। फिर प्रश्न उठता है कृ सही और गलत क्या है? जो नशा पाप से बचाए, पुण्य की राह दिखाए, स्वयं से मिलाए और परमात्मा बनाए, वह नशा श्रेष्ठ और कल्याणकारी है। ऐसा नशा हर व्यक्ति को होना चाहिए। जो नशा पाप की राह पर ले जाए, स्वयं से दूर करे और इंसान को इंसानियत से गिराकर शैतान बना दे,वह नशा केवल बुरा ही नहीं, बल्कि जीवन के लिए अत्यंत घातक है।

डिप्रेशन के दो बड़े दुष्परिणाम सामने आते हैं- भय और नशा

आज 20ः लोग एक अदृश्य नशे में डूबे हुए हैं-एंटी-डिप्रेसेंट और नींद की दवाओं का नशा। जब जीवन में दबाव बढ़ता है, वह तनाव में बदलता है; तनाव से उदासी जन्म लेती है, उदासी से अकेलापन, और अंततः डिप्रेशन। फिर इस डिप्रेशन के दो बड़े दुष्परिणाम सामने आते हैं- भय और नशा। बीमारी से बचने के लिए ली गई दवा ही धीरे-धीरे बीमारी का कारण बन जाती है। आज पूरी दुनिया कहीं न कहीं इसी संघर्ष से गुजर रही है। मेरा आध्यात्मिक चिंतन कहता है- यदि आप डिप्रेशन की दवा ले रहे हैं या नींद की गोलियों पर निर्भर हैं तो सावधान हो जाइए और 24 घंटे में केवल 10 मिनट आत्मचिंतन अवश्य कीजिए। अपने आप से पूछिए-मैं यह सब किसके लिए कर रहा हूँ? जो मैं कर रहा हूँ, क्या वह वास्तव में मेरा स्वभाव है? जीवन का सारा खेल केवल एक श्वास का है। क्यों न हम प्रतिदिन 10 मिनट अपनी आती-जाती श्वास को देखें और समझें कृ श्वास का आना जीवन है और श्वास का रुक जाना मृत्यु। यह चिंतन ही हमें शुभ परिणामों की ओर ले जाएगा, और फिर जो होगा, वह शुभ ही होगा।

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