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प्राकृत भाषा की पुकार, बंद होती संस्थाओं को बचाएं : प्राकृत भाषा हमारी पहचान है


प्राकृत भाषा वही भाषा है, जिसे हम शास्त्रीय भाषा के रूप में जानते हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह हमारी सबसे प्राचीन और स्वाभाविक भाषा है। ‘प्राकृत’ का अर्थ ही होता है-मूल स्वभाव, यानी वह भाषा जो मन से स्वतः निकलती है। मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, मनोज जैन नायक की इस प्रस्तुति में अंशुल जैन शास्त्री का आलेख…


मुरैना/सांगानेर। प्राकृत भाषा वही भाषा है, जिसे हम शास्त्रीय भाषा के रूप में जानते हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह हमारी सबसे प्राचीन और स्वाभाविक भाषा है। ‘प्राकृत’ का अर्थ ही होता है-मूल स्वभाव, यानी वह भाषा जो मन से स्वतः निकलती है। ‎पहले के समय में लोग आपस में प्राकृत में ही संवाद किया करते थे। यह कोई कठिन या भारी भाषा नहीं थी, बल्कि बेहद सरल, सहज और जन-जन की भाषा थी। इसके दो रूप माने जाते हैंकृएक बोलचाल का (कथ) और दूसरा साहित्य का। इसकी व्याकरण भी बहुत व्यवस्थित और प्रमाणिक मानी जाती है।

‎जैन आचार्यों ने प्राकृत भाषा को अपने ज्ञान और दर्शन का माध्यम बनाया। षठखंडागम समयसार, नियमसार, द्रव्यसंग्रह इत्यादि जैसे महान ग्रंथ इसी भाषा में रचे गए। ये सिर्फ ग्रंथ नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर और आध्यात्मिक विरासत हैं। प्राकृत साहित्य इतना व्यापक है कि आज भी कई ग्रंथ उपलब्ध हैं, हालांकि कुछ समय के साथ लुप्त भी हो गए। ‎समय बदला और हम भी बदल गए। आज हम हिंदी में बातचीत करते हैं, लेकिन इसका यह मतलब यह नहीं कि प्राकृत की महत्ता कम हो गई। यह भाषा आज भी हमारे अतीत की पहचान और हमारी जड़ों की आवाज़ है।

पूर्व के विद्वानों और महापुरुषों ने इस भाषा के संरक्षण के लिए कई संस्थाओं और शोध केंद्रों की स्थापना की थी। वहां ग्रंथों का संरक्षण होता था, शोध होता था और भाषा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता था ‎लेकिन, आज की स्थिति थोड़ी चिंताजनक है। देश में ऐसी कई संस्थाएं या तो बंद हो रही हैं या उपेक्षा का शिकार बन चुकी हैं। इसका ताजा उदाहरण बिहार का अहिंसा शोध संस्थान है, जिसे बंद कर दिया गया। यह सिर्फ एक संस्था का बंद होना नहीं, बल्कि हमारी धरोहर पर एक आघात है। ‎अब सोचने वाली बात यह है कि अगर इसी तरह संस्थाएं खत्म होती रहीं तो आने वाली पीढ़ी प्राकृत भाषा से पूरी तरह अनजान हो जाएगी। यह केवल भाषा का नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और इतिहास का भी नुकसान होगा।

अब समय आ गया है कि हम, खासकर जैन समाज, इस विषय पर जागरूक हो। केवल चिंता करने से कुछ नहीं होगा, हमें आगे आकर प्रयास करना होगा। सरकार से भी अपेक्षा रखनी होगी कि वह इन संस्थाओं को पुनः जीवित करे। अंत में बस इतना ही-प्राकृत भाषा सिर्फ अतीत की बात नहीं है, यह हमारी पहचान है। अगर हमने आज इसे नहीं बचाया, तो कल शायद इसे याद करने का भी अवसर नहीं मिलेगा।

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