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गिरनार पर्वत एक नाम नहीं, जैन धर्म की विरासत है : अपनी विरासत को प्राप्त करना चाहते हैं तो जन-जन को जागना होगा 


भारतवर्ष के गुजरात प्रांत में जूनागढ़ जिले में स्थित गिरनार पर्वत भगवान नेमीनाथ की मोक्ष स्थली होने के कारण गिरनार पर्वत यह एक नाम नहीं अपितु एक इतिहास है एक विरासत है। किसकी विरासत ? तो यह विरासत है जैन धर्म की, विरासत है विश्व धर्म की। मुरैना से पढ़िए, अरिहंत जैन शास्त्री, मलगुवां का आलेख, प्रस्तुति मनोज जैन नायक की…


मुरैना। भारतवर्ष के गुजरात प्रांत में जूनागढ़ जिले में स्थित गिरनार पर्वत भगवान नेमीनाथ की मोक्ष स्थली होने के कारण गिरनार पर्वत यह एक नाम नहीं अपितु एक इतिहास है एक विरासत है। किसकी विरासत ? तो यह विरासत है जैन धर्म की, विरासत है विश्व धर्म की । क्योंकि जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर हुए जिनमें से प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जिनका वर्णन ऋग्वेद में भी हमें प्राप्त होता है उनको इस सृष्टि का युग प्रवर्तक भी कहा जाता है ऐसे ही कम से अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया और वह मुक्ति को प्राप्त होते गए मोक्ष पद को प्राप्त हुए ऐसे ही जैन धर्म के 22 में तीर्थंकर नेमिनाथ जी का समय आज से लगभग 86,500 वर्ष पूर्व माना जाता है अगर भगवान नेमिनाथ जी की गृहस्थ अवस्था को जाने तो यह बालक नेमिकुमार के नाम से प्रचलित राजा समुद्र विजय के पुत्र हुए यह श्री कृष्ण के चचेरे भाई कहे जाते हैं और श्री कृष्ण का समय महाभारत से ज्ञात होता है। उसी समय बालक नेमी कुमार की शादी का प्रस्ताव महाराज ने रखा तो जब उनकी शादी के लिए बारात निकली तो पशुओं का बंधन देखकर वह अपना रथ गिरनार पर्वत की ओर परिवर्तित करवा लेते हैं क्योंकि वह कहते हैं कि मेरे सुख के लिए इतने मूक प्राणियों को दुख होना यह सुख का कारण नहीं हो सकता और मैं अपना रथ गिरनार पर्वत की ओर मुड़ा लेते हैं और उनके साथ कई राजा दीक्षा को लेते हैं। बालक नेमी कुमार की आयु जो 1000 वर्ष प्रमाण रही है उसमें से उनकी 300 वर्ष प्रमाण आयु तो मात्र बाल्यावस्था की रही उसके बाद यह निरंतर 700 वर्ष मुनि नेमी कुमार के रूप में तप साधना में व्यतीत होते हैं इन्होंने मात्र 56 दिनों में कठिन तपस्या के माध्यम से केवल ज्ञान की प्राप्ति कर ली थी गिरनार पर्वत से उसके बाद यह निरंतर लगभग 700 वर्षों तक केवल ज्ञान की पर्याय को प्राप्त करके निरंतर धर्म उपदेश देते रहे और जैन ग्रंथों के प्रमाण अनुसार, उन्होंने कुल 699 वर्ष, 9 महीने और 4 दिन तक धर्म प्रचार के लिए विहार (भ्रमण) किया।

उसके बाद उन्होंने अपनी संपूर्ण आयु 1000 वर्ष समाप्त करने के बाद गिरनार पर्वत से मुक्ति को प्राप्त किया। वही पांचवी टोंक जो आज के समय में विवाद का कारण बन रही है यह गिरनार पर्वत की पांचवी टोंक जहां पर नेमिनाथ भगवान के चरण चिह्न भी प्राप्त होते हैं अपितु 2014 के बाद यह टोंक कुछ धर्म विरोधियों के छल के माध्यम से उनके हाथों में पहुंच चुकी है लेकिन जब उस टोंक की वंदना के लिए दर्शन के लिए जाते हैं तो वहां ज्ञात होता है कि यहां नेमिनाथ भगवान के चरण है और यह नेमिनाथ भगवान की मोक्ष स्थली है अगर अभी भी जैन नहीं जागे तो नेमिनाथ भगवान की निर्माण स्थल को ना चाहते हुए भी खोना पड़ेगा और जो हमारी जैन विरासत है उसको जन-जन तक पहुंचाने का इतिहास का एक और जैन धर्म की प्राचीनता को सिद्ध करने का साधन समाप्त हो जाएगा और अगर अपनी विरासत को प्राप्त करना चाहते हैं तो जन-जन को जागना पड़ेगा और अधिक से अधिक गिरनार पर्वत की वंदना करनी पड़ेगी, और अधिक से अधिक गिरनार पर्वत की ओर बढ़ना पड़ेगा।

हां, यह वही गिरनार पर्वत जो आज कुछ धर्म विरोधियों के कारण अपनी पवित्रता खो रहा है क्योंकि कुछ धर्म विरोधी इस पवित्र पर्वत को अपवित्रता की ओर धकेल रहे हैं, एक ओर यह भूमि विभिन्न मुनिराजों तथा नेमिनाथ भगवान के कारण से यह एक पवित्र स्थल रहा है क्योंकि वर्तमान में इसकी अपवित्रता को बढ़ाने के लिए विभिन्न कार्य किया जा रहे हैं अगर ऐसे ही गिरनार पर्वत की अपवित्रता बढ़ती गई तो वह एक दिन दूर नहीं जब इतिहास नष्ट होते हुए अपन अपनी स्वयं की आंखों से देख पाएंगे क्योंकि यह एक गिरनार पर्वत एक परम आस्था का केंद्र रहा है क्योंकि यह अपनी एक विशाल चोटी के माध्यम से सबको आकर्षित एवं अतिशय के माध्यम से अपनी ओर खींचता है इस पर्वत की विशाल गरिमा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए सभी को जागना ही पड़ेगा, यह नेमिनाथ भगवान की मोक्ष स्थली है अगर अभी भी जैन नहीं जागे तो नेमिनाथ भगवान की निर्माण स्थल को ना चाहते हुए भी खोना पड़ेगा और जो हमारी जैन विरासत है उसको जन-जन तक पहुंचाने का इतिहास का एक हिस्सा और जैन धर्म की प्राचीनता को सिद्ध करने का साधन समाप्त हो जाएगा।

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