तेज रफ्तार और तनाव से भरे आधुनिक जीवन में जहां व्यक्ति भौतिक उपलब्धियों के पीछे दौड़ते-दौड़ते मानसिक शांति खोता जा रहा है, वहीं धर्म और तप की परंपरा आज भी जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने का मार्ग दिखा रही है। लुधियाना से पढ़िए, यह खबर…
लुधियाना। तेज रफ्तार और तनाव से भरे आधुनिक जीवन में जहां व्यक्ति भौतिक उपलब्धियों के पीछे दौड़ते-दौड़ते मानसिक शांति खोता जा रहा है, वहीं धर्म और तप की परंपरा आज भी जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने का मार्ग दिखा रही है। जैन धर्म में तप, त्याग और संयम को जीवन को परिष्कृत करने का सबसे प्रभावी माध्यम माना गया है। विशेषकर अक्षय तृतीया का पर्व जैन परंपरा में तप, साधना और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इसी दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने दीर्घकालीन तपस्या के पश्चात प्रथम पारणा किया था। इसी आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए लुधियाना के सिविल लाइन रोड स्थित श्री एस.एस. जैन सभा, जैन स्थानक में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर भव्य पारणोत्सव का आयोजन किया गया। श्रमण संघीय सलाहकार दिनेश मुनि म.सा. के सानिध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में 38 वर्षीतप आराधकों के सामूहिक पारणे इक्षुरस से सम्पन्न कराए गए। 13 श्रमण- श्रमणी और 25 आराधक आराधिकाओं का पारणा संपन्न हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे और तपस्वियों की अनुमोदना करते हुए धर्मलाभ प्राप्त किया।कार्यक्रम के दौरान पूरा जैन स्थानक भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया। जय जिनेन्द्र, वर्षीतप तपस्वियों की जय और भगवान आदिनाथ की जय के जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो उठा। देश के विभिन्न क्षेत्र से पहुंचे श्रद्धालुओं ने इस आध्यात्मिक आयोजन में भाग लेकर तपस्वियों की साधना के प्रति श्रद्धा व्यक्त की।
संतुलित जीवन की प्रेरणा
धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिनेश मुनि म.सा. ने कहा कि जीवन सभी को मिला है, लेकिन जीवन जीने की कला हर किसी को नहीं आती। जो व्यक्ति जीवन जीने की कला सीख लेता है, वही अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। उन्होंने कहा कि भगवान आदिनाथ का जीवन हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन, संयम और त्याग कितना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि यदि व्यक्ति भगवान आदिनाथ के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने व्यवहार में बदलाव करे तो वह अपने जीवन को शांत, संतुलित और सार्थक बना सकता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में सब कुछ हमारे अनुसार नहीं होता। व्यक्ति को जो प्राप्त हो उसमें संतोष रखना चाहिए। असंतोष व्यक्ति को तनाव और दुख की ओर ले जाता है, जबकि संतोष जीवन में शांति देता है। उन्होंने भगवान आदिनाथ को श्रेयांस कुमार द्वारा पारणा कराने के ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि दान तभी सार्थक होता है जब उससे सामने वाले की आवश्यकता पूरी हो। उन्होंने कहा कि हमें ऐसा दान देना चाहिए जिससे दूसरों की समस्या का समाधान हो सके।
वर्षीतप तपस्या की महत्ता बताई
पूज्य मुनिश्री ने कहा कि वर्षीतप अत्यंत कठिन और अनुशासित तपस्या है। इसमें साधक पूरे वर्ष नियमित संयम और उपवास के साथ तप साधना करता है। ऐसी तपस्या आत्मशुद्धि और आत्मबल को मजबूत करने का माध्यम बनती है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं तपस्या नहीं कर सकता, वह तपस्वियों की अनुमोदना कर या पारणा कराकर भी पुण्य का भागी बन सकता है।
37 वर्षीतप तपस्वियों के पारणे सम्पन्न
धर्मसभा के पश्चात 37 वर्षीतप तपस्वियों के पारणे विधिवत इक्षुरस से सम्पन्न कराए गए। श्रीसंघ की ओर से सभी तपस्वियों का बहुमान तिलक, माला पहनाकर व चाँदी का कलश भेंट कर भव्य स्वागत एवं बहुमान किया गया। श्रद्धालुओं में तपस्वियों को पारणा कराने का लाभ लेने की होड़ देखी गई। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने तपस्वियों के चरणों में वंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
भक्तिमय माहौल में हुआ आयोजन
कार्यक्रम के दौरान भक्ति गीत, मंगलाचरण और स्तुति पाठ से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए और तपस्वियों की साधना की अनुमोदना करते रहे। गौतम प्रसादी व इक्षुरस लाभार्थी गुरु भक्त विजय कुमार नीरू जी जैन (जैन पैकवेल) लुधियाना थे। देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने कार्यक्रम में भाग लेकर धर्मसभा का लाभ प्राप्त किया।
अक्षय तृतीया का विशेष महत्व
अक्षय तृतीया जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इसी दिन भगवान आदिनाथ ने दीर्घकालीन तपस्या के बाद प्रथम पारणा किया था। इस कारण इस दिन वर्षीतप तपस्वियों के पारणे का विशेष महत्व होता है।
श्रीसंघ ने व्यक्त किया आभार
कार्यक्रम के अंत में एसएस जैन सभा के पदाधिकारियों ने सभी तपस्वियों, आगंतुक श्रद्धालुओं और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। समारोह में गौतम प्रसादी लाभार्थी परिवार विजयकुमार नीरू जैन (जैन पैकवैल) लुधियाना थे। अक्षय तृतीया के इस भव्य पारणोत्सव में तप, भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान की।
45 साधु-साध्वियों का रहा पावन सान्निध्य
इस भव्य आयोजन में श्री दिनेश मुनि जी महाराज, डॉ. श्री द्वीपेन्द्र मुनि जी महाराज, डॉ. श्री पुष्पेन्द्र मुनि जी महाराज (ठाणा-3) सहित महासाध्वी श्री प्रियदर्शना जी महाराज (ठाणा-7), महासाध्वी श्री रमेश कुमारी जी महाराज (ठाणा-7), महासाध्वी श्री मीना जी महाराज (ठाणा-5), महासाध्वी श्री वीर कांता जी महाराज (ठाणा-6), महासाध्वी श्री श्रेष्ठा जी महाराज (ठाणा-5), महासाध्वी श्री स्वाति जी महाराज (ठाणा-7),महासाध्वी श्री सुनिधि जी महाराज (ठाणा-4), डॉ. मनीषा जी महाराज 45 साधु-साध्वियों का पावन सान्निध्य ने इस आयोजन को विशेष बनाया।
वर्षीतप आराधक संत-साध्वी वृन्द
इस अवसर पर साधु-साध्वी वृन्द में डॉ. श्री दीपेन्द्र मुनि जी महाराज (उपवास 11वां), डॉ. श्री पुष्पेन्द्र मुनि जी महाराज (एकासन 11वां), साध्वी श्री सुनिधि जी महाराज (उपवास 22वां), साध्वी श्री शमा जी महाराज (उपवास 16वां), साध्वी डॉ. अर्पिता जी महाराज (उपवास 12वां), साध्वी श्री मोक्षदा जी महाराज (उपवास तीसरा), साध्वी डॉ. विचक्षणश्री जी महाराज (एकासन से वर्धमान ओली), साध्वी डॉ. मनीषा जी महाराज (एकासन 22वां), साध्वी डॉ. आर्या जी महाराज (आयंबिल प्रथम), साध्वी श्री शानवी जी महाराज (एकासन 7वां), साध्वी श्री कर्णिका जी महाराज (एकासन द्वितीय), साध्वी श्री मणि जी महाराज (एकासन प्रथम) तथा साध्वी श्री वीरांशी जी महाराज प्रथम वर्षीतप पारणा इक्षुरस से संपन्न किया ।
वर्षीतप आराधक श्रद्धालु
वर्षीतप करने वाले श्रद्धालुओं में आशा रानी जैन (चौविहार व्रत 33वां), इन्द जैन (उपवास 28वां), पंकज जैन (उपवास 5वां), मोहिंदर पाल जैन (उपवास चौथा), रिंकी जैन (6 वर्ष एकासन), पंकज जैन (2 वर्ष उपवास), मोहिनी जैन (एकासन 10वां), राजरानी जैन (एकासन 7वां), सिम्मी जैन (एकासन 7वां), स्वतंत्र बाला जैन (एकासन 6वां), तमन्ना जैन (एकासन चौथा), किरण जैन (एकासन चौथा), पूनम जैन (एकासन चौथा), सुनीता अरोड़ा (एकासन चौथा), पवन कुमार जैन (एकासन चौथा), वीना जैन (एकासन दूसरा), सुनीता जैन (एकासन प्रथम), नीतू जैन (एकासन प्रथम), रमा जैन (एकासन प्रथम) तथा दिशा जैन प्रथम, वैरागन प्राची जैन चौथा एकासन, श्री यशपाल जैन एकासन दूसरा, करण जैन उपवास का प्रथम, ज्योति जैन एकासन प्रथम, सीमा जैन तीसरा एकासन वर्षीतप पारणा संपन्न किया।













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