इंदौर के समर्थ सिटी स्थित पार्श्वनाथ जिनालय में मुनि विमल सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए आत्मज्ञान और विवेक की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भौतिक सुख-सुविधाओं को दुर्गति बताते हुए संयम और साधना का संदेश दिया। पढ़िए रिपोर्टर ओम पाटोदी की यह खबर……
इंदौर के समर्थ सिटी स्थित पार्श्वनाथ जिनालय में मुनि श्री विमल सागर जी महाराज ने अल्प प्रवास के दौरान अपने प्रवचन में कहा कि यह जीव देह रूपी पिंजरे में कर्मों के अधीन होकर अनंत जन्मों से भटक रहा है। मोक्ष ही इसका अंतिम लक्ष्य है, जो बिना आत्मज्ञान के संभव नहीं।
कर्म और जीव का संबंध समझाया
मुनि श्री ने सरल भाषा में बताया कि जीव और कर्म दो अलग शक्तियां हैं, लेकिन कर्मों का प्रभाव अधिक होने से जीव दुखों को भोगता रहता है। इससे मुक्त होने के लिए विवेक जागृत करना आवश्यक है, जो जिनमत के अनुसरण से ही संभव है।
भौतिकता को बताया दुर्गति
उन्होंने कहा कि आज की भौतिक प्रगति वास्तव में दुर्गति है। जितनी सुविधाएं बढ़ती हैं, उतनी ही हमारी तृष्णा भी बढ़ती जाती है, जिससे आत्मज्ञान दूर होता जाता है।
तीन बाधाएं—क्षुधा, निद्रा और तृष्णा
मुनि श्री ने बताया कि क्षुधा, निद्रा और तृष्णा ये तीन प्रमुख बाधाएं हैं, जो आत्मज्ञान में रुकावट बनती हैं। यदि इन्हें बढ़ाया जाए तो यह बढ़ती जाती हैं, और यदि इन्हें नियंत्रित किया जाए तो यह कम हो जाती हैं।
निर्णय हमारे हाथ में
उन्होंने कहा कि यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम संसार में भटकते रहें या इन वासनाओं को नियंत्रित कर आत्म स्वतंत्रता यानी मोक्ष की ओर बढ़ें।
स्मृति नगर की ओर विहार
प्रवचन के पश्चात मुनि श्री का विहार स्मृति नगर की ओर हुआ, जहां आगे भी उनके सानिध्य में धर्मलाभ का अवसर मिलेगा।













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