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धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी के 11 अद्वितीय संकल्प :  जहाँ तपस्या सूर्य के समान तपती है और ज्ञान गंगा के समान बहता है, वहाँ ‘परमात्मा’ का निवास होता है।


भारतीय ऋषि-परंपरा के गौरव, वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी का जीवन केवल एक संत का जीवन नहीं है; यह एक ‘जीवंत इतिहास’ है, जो कलिकाल में भी भगवान महावीर के युग की याद दिलाता है। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट…


डडूका। भारतीय ऋषि-परंपरा के गौरव, वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी का जीवन केवल एक संत का जीवन नहीं है; यह एक ‘जीवंत इतिहास’ है, जो कलिकाल में भी भगवान महावीर के युग की याद दिलाता है। साधु जीवन केवल भेष बदलना नहीं, बल्कि स्वयं को पूर्णतः ‘अनात्मा’ से पृथक कर लेना है। गुरुदेव ने 1978 (सम्मेदाचल) में ली गई 11 प्रतिज्ञाओं और इसके बाद अंगीकार किए गए नियमों से एक ऐसी चर्या स्थापित की है, जो दिगंबरत्व की पराकाष्ठा है।

यहाँ उन 11 नियमों और उनके पीछे के गुरुदेव के गहन चिंतन का विस्तृत प्रकाश है

जन्म जयन्ती न मनाने का संकल्प दर्शन: गुरुदेव कहते हैं— “जन्म-जरा-मरण के नाश के लिए ही मैं साधु बना हूँ।” जो स्वयं जन्म के चक्र से छूटना चाहता है, वह देह के जन्म का उत्सव कैसे मना सकता है? अतः वे किसी भी प्रकार की दीक्षा या जन्म जयन्ती के आयोजन से स्वयं को दूर रखते हैं।

पूर्व गृहस्थ संबंध का पूर्ण त्याग दर्शन: गृहत्यागी होने के बाद ‘मोह’ का त्याग अनिवार्य है। गुरुदेव के लिए अब केवल ‘पंचपरमेष्ठी’ ही बंधु हैं और ‘वैश्विक कुटुम्ब’ ही परिवार। रत्नत्रय (सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र) ही उनका वास्तविक वैभव है।

याचना और भौतिक निर्माण से दूरी

दर्शन: मुमुक्षु-भिक्षुक हूँ मैं, भिखारी नहीं। गुरुदेव किसी भी भौतिक निर्माण (मंदिर, भवन आदि) के लिए न चंदा करते हैं, न याचना। वे केवल आत्म-साधना और ज्ञान-दान के निमित्त जीते हैं।

प्रसिद्धि और ख्याति का निषेध दर्शन: आत्मा की सिद्धि के लिए राग-द्वेष-मोह का त्याग आवश्यक है। इसलिए वे पूजा, ख्याति और दिखावे के लोभ से कोसों दूर, पूर्णतः ‘निराडम्बर’ समता भाव में स्थिर रहते हैं।

भेद-भाव रहित व्यवहार दर्शन:

श्रमण बनने का अर्थ ही ‘समता’ है। गुरुदेव के चिंतन में “मेरा-तेरा” का कोई विभाग भाव नहीं है। वे संक्लेश और संकल्प-विकल्प से रहित होकर सदाकाल समता भाव में रहते हैं।

दम्भ और प्रलोभन से विरक्ति दर्शन: आत्मविश्वास, ज्ञान और चरित्र ही सच्चा धर्म है। इसके विपरीत जो भी दम्भ या बाहरी प्रलोभन है, वह अधर्म है। गुरुदेव दबाव और भय से मुक्त होकर आगमोक्त चर्या पालते हैं।

विज्ञापन और प्रदर्शन का त्याग दर्शन: वे पत्रिका विज्ञापन, निमंत्रण, माइक, मंच या किसी भी प्रकार के ‘तामझाम’ को अनावश्यक मानते हैं। वे केवल सहज साधना और निःस्पृह भाव से ही प्रवृत्त होते हैं।

निःस्पृह वृत्ति (अकिंचन्य भाव) दर्शन: अपना प्रभुत्व (Dominance) या वर्चस्व स्थापित करने के लिए वे कोई कार्य नहीं करते। वे संस्थानों का नामकरण अपने नाम पर करने के घोर विरोधी हैं।

धर्म प्रचार के सहज साधन दर्शन: गुरुदेव के लिए प्रचार का अर्थ है— ध्यान, अध्ययन, लेखन और प्रवचन। वे स्वेच्छा से जुड़ने वाले भक्तों के माध्यम से ही सहज और सरल शांति के साथ धर्म का प्रसार करते है।

सिंहासन एवं ऊँचे आसनों का त्याग दर्शन: एक दिगंबर संत के लिए भूमि ही श्रेष्ठ आसन है। गुरुदेव ने ऊँचे सिंहासनों का त्याग कर सादगी और लघुता का मार्ग चुना है, जो उनके ‘अभिमान-शून्यता’ का प्रतीक है।

वैश्विक आध्यात्मिक, लक्ष्य,दर्शन: उनका एकमात्र लक्ष्य है

— वैश्विक, उदार, अनेकांतमय और वैज्ञानिक आध्यात्मिक मार्ग को प्रशस्त करना। वे 300 से अधिक साधुओं के ‘शिक्षागुरु’ हैं। वे संपूर्ण पंथ मत संकीर्णता से परे ,जन -धन -बोलीं आदि पराश्रित से पूर्ण दूर रहकर परम अध्यात्म लक्ष्य की पूर्ति कर रहे हैं।

सारांश: ये 11 संकल्प सिद्ध करते हैं कि गुरुदेव “स्वार्थ से परमार्थ” और “मोह से मोक्ष” की ओर बढ़ते हुए एक ऐसे वैज्ञानिक संत हैं, जिनकी हर क्रिया के पीछे एक ठोस आध्यात्मिक तर्क है। यह विस्तृत जानकारी मुनि भक्त शाह मधोक जैन चितरी ने दी।

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