समाचार

खान-पान और संस्कारों से ही सुधरेगा जीवन: आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने दी बांसवाड़ा में मंगल देशना


बाहुबली कॉलोनी स्थित सुमतिनाथ जिनालय में ससंघ विराजमान आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने अपने अमृत वचनों से श्रावकों को जीवन के कड़वे सत्य और वर्तमान विद्रूपताओं से परिचित कराया। उन्होंने बड़े ही सटीक व्यंग्य और उदाहरणों के माध्यम से समाज की दोहरी मानसिकता और बिगड़ती जीवनशैली पर प्रहार किया। बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह खबर…


बांसवाड़ा। बाहुबली कॉलोनी स्थित सुमतिनाथ जिनालय में ससंघ विराजमान आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने अपने अमृत वचनों से श्रावकों को जीवन के कड़वे सत्य और वर्तमान विद्रूपताओं से परिचित कराया। उन्होंने बड़े ही सटीक व्यंग्य और उदाहरणों के माध्यम से समाज की दोहरी मानसिकता और बिगड़ती जीवनशैली पर प्रहार किया। समाज के प्रवक्ता महेंद्र कवालिया ने बताया कि आचार्य श्री ने आज की परिस्थितियों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि इंसान की संवेदनाएं अब स्वार्थ तक सीमित हो गई हैं। उन्होंने कहा, “आज का दौर वह है जहाँ अपना बेटा रोए तो दिल में दर्द होता है, लेकिन दूसरे का बेटा रोए तो सिर में दर्द होता है। अपनी पत्नी रोए तो सिर दुखता है पर पड़ोसी की रोए तो दिल में दर्द होता है। गुरुदेव ने सचेत किया कि यह पंचम काल है, यहाँ सावधानी जरूरी है। हर बिल में हाथ डालना जोखिम भरा हो सकता है क्योंकि, जरूरी नहीं कि हर जगह चूहा ही हो, वहां सांप भी हो सकते हैं। इंसान बीमार, जानवर स्वस्थ: कारण है खान-पान

गुरुदेव ने स्वास्थ्य और व्यसनों पर गंभीर चर्चा करते हुए कहा कि आज इंसान शुगर, बीपी और कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहा है, जबकि जानवर इन रोगों से मुक्त हैं। उन्होंने तर्क दिया, इंसान वह सब खाता है जो जानवर कभी नहीं छूता। एक गधा भी कभी विमल, रजनीगंधा, माणिकचंद या बीड़ी-सिगरेट का सेवन नहीं करता, इसीलिए उसे ऐसी बीमारियाँ नहीं होतीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर की भूख मात्र दो रोटी की है, लेकिन मन का गड्ढा अनंत है जो कभी नहीं भरता। माता-पिता की सेवा ही सच्ची कमाई बुढ़ापे और संस्कारों पर जोर देते हुए अंतर्मना ने कहा कि जिस माता-पिता ने तुम्हारा बचपन संवारा, बुढ़ापे में उनकी लाठी बनना तुम्हारा धर्म है। जीवन का मंत्र देते हुए उन्होंने कहा— ‘जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है।’ जो मिला है उसे पसंद करना सीखें और जो पसंद है उसे पुरुषार्थ से प्राप्त करें। इस दुर्लभ मानव पर्याय को धर्म के मार्ग पर लगाकर सद्गति की ओर कदम बढ़ाएं। अतीत, भविष्य और वर्तमान का अंतर प्रवचन के अंत में गुरुदेव ने युवाओं और बुजुर्गों की मनोवैज्ञानिक परिभाषा देते हुए एक चिंतन छोड़ दिया। उन्होंने कहा जो अतीत की बातें करते हैं, वे बुजुर्ग हैं। जो भविष्य की कल्पनाओं में खोए हैं, वे बच्चे हैं।लेकिन जो वर्तमान में जीते हैं और कर्म करते हैं, वही असली युवा हैं।अब आपको तय करना है कि आप किस श्रेणी में आना चाहते हैं।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shree Phal News

About the author

Shree Phal News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page