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पुण्य से ही सुख संपत्ति की प्राप्ति होती है : आचार्यश्री निर्भयसागर जी के प्रवचनों से बढ़ रही प्रभावना


सांसारिक प्राणी अपने कर्मों से ही सुख और दुख प्राप्त करता है। संसार में जीवन यापन करते हुए मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसी अनुरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होती है। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट…


मुरैना। सांसारिक प्राणी अपने कर्मों से ही सुख और दुख प्राप्त करता है। संसार में जीवन यापन करते हुए मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसी अनुरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होती है। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। आचार्य श्री ने कहा कि अच्छे कर्म करने पर पुण्य और बुरे कर्म करने पर पापों का संचय होता है। आपके स्वयं के कर्म ही आपके भाग्य का निर्माण करते हैं। ईश्वर न किसी को दुख देता है और न ही किसी को सुख देता है। जब आपके पुण्य कर्म अर्थात अच्छे कर्म उदय में आते हैं तो आपको सभी प्रकार के सुखों सहित धन संपदा की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत जब आपके पाप कर्म अर्थात बुरे कर्म उदय में आते हैं तो अनेकों प्रकार के दुखों को प्राप्त करते हुए धन संपदा विहीन जीवन यापन करना होता है। कर्म किसी का पीछा नहीं छोड़ते, वे अपना फल अवश्य देते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है – ‘जब तक तेरे पुण्य का बीता नहीं करार, अवगुण तेरे माफ हैं चाहे करो हजार’।आचार्य श्री निर्भयसागरजी महाराज ने पुण्य और पाप की व्याख्या करते हुए बताया कि आवश्यक नहीं है कि धन से ही पुण्य का संचय किया जाए अथवा धन के द्वारा ही अच्छे कार्य किए जाएं। आप जीवन यापन करते हुए, अपने सांसारिक जीवन में छोटे छोटे अनेकों अच्छे सदाचारी कार्यों द्वारा भी पुण्य का संचय कर सकते हैं। खोटे कार्यों से दूर रहकर पाप कर्मों से दूर रह सकते हैं। वर्तमान में साधु संत चलते फिरते तीर्थ अथवा इष्ट के समान हैं। जब भी आपको साधु संतों का सान्निध्य मिले, तो उस अवसर का भरपूर लाभ उठाना चाहिए । साधुओं की संयम साधना में सहभागिता प्रदान करने से भी पुण्य का संचय होता है ।

इसके विपरीत साधु संतों का उपहास करने, उनकी साधना में खलल डालने से अशुभ अर्थात पाप कर्मों का संचय होता है। इसलिए हमें सदैव साधु संतों की सेवा, पीड़ित मानवों, दीन दुखी व्यक्तियों की सेवा, मूक पशु पक्षियों की सेवा आदि करते हुए अच्छे कर्म करते हुए पुण्य का संचय करना चाहिए और खोटे कार्यों से दूर रहकर पाप कर्मों से बचना चाहिए। ताकि हमारे सांसारिक जीवन के इस भव के साथ आगामी भव भी सुधार सकें और हमें मोक्ष मार्ग की प्राप्ति हो सकें।

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