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बुढा़र के पंचकल्याणक महामहोत्सव में मुनिराजों का मंगल प्रवेश : जयकारों और मंगल ध्वनि के साथ हुई संघ की अगवानी 


पंचकल्याणक की शुरुआत हो, उसके पूर्व यदि मंगल घड़ियां घट जाए तो वह सोने में सुहागा के रूप में घटित हो जाया करता है। बुधवार से श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के पंचकल्याणक मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज, मुनि श्री प्रसाद सागरजी महाराज, मुनि श्री शीतलसागरजी महाराज, मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में प्रातः 7.30 बजे घटयात्रा के साथ प्रारंभ होगा। शहडोल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह रिपोर्ट…


शहडोल। पंचकल्याणक की शुरुआत हो, उसके पूर्व यदि मंगल घड़ियां घट जाए तो वह सोने में सुहागा के रूप में घटित हो जाया करता है। बुधवार से श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के पंचकल्याणक मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज, मुनि श्री प्रसाद सागरजी महाराज, मुनि श्री शीतलसागरजी महाराज, मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में प्रातः 7.30 बजे घट यात्रा के साथ प्रारंभ होगा। उसके पूर्व बेला में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के शिष्यों का मंगल मिलन मंगलवार के दिन हुआ। मुनि श्री प्रसादसागरजी महाराज एवं मुनिश्री शीतलसागर महाराज, जो शहडोल में विराजमान थे। वे बुढा़र समाज के आमंत्रण एवं मुनि श्री के वात्सल्य को स्वीकार करते हुए श्री शांतिनाथ भगवान के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव में पधारे तो उपस्थित जनसमुदाय का उत्साह चरम पर था। उन्होंने आचार्य श्री विद्यासागरजी एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज की जय जयकार करते हुए गगनभेदी नारों से वातावरण को धर्ममय कर दिया। इस अवसर पर प्रतिष्ठाचार्य अभय भैया एवं अशोक भैया ने मंच संचालन किया।

योग और संयोग बने कि दो की जगह चार मुनिराज जुड़ गए 

धर्म सभा में मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने कहा कि आप सभी लोग आज बहुत उत्साहित और आनंदित हैं। उत्साह और आनंद को बढ़ाने के लिए ऐसे आलंबन को अपनाइए। जिससे आपका आनंद और उत्साह दुगना हो सके तथा ऐसे निमित्तों से बचना है जो आपके आनंद और उत्साह को भंग करे। उन्होंने कहा कि हमने अहोभाव, अहंभाव, भक्ति भाव और मुक्तिभाव इन चारों बातों को अपनाना है। मुनि श्री ने बुढा़र वालों के प्रबल पुण्य की चर्चा करते हुए कहा कि इतने बड़े और विशाल जिनालय के पंचकल्याणक भव्यातिभव्य तरीके से कराने का योग और संयोग बने कि दो की जगह चार मुनिराज जुड़ गए हैं तो चार चांद तो लगना ही है।

आत्मोत्थान और जीवन का कल्याण होना चाहिए

उन्होंने कहा कि मुझे बहूत प्रसन्नता है कि मुनिद्वय ने बुढा़र समाज और हमारी बात को स्वीकार करते हुए इस आयोजन में आए और प्रयोजन रच गया। उन्होंने आयोजन के प्रयोजन को सामने रखते हुए कहा कि हमारा प्रयोजन कार्यक्रम की संपन्नता नहीं, हमारा प्रयोजन आत्मबोध के साथ आत्मोत्थान और जीवन का कल्याण होना चाहिए। पंचकल्याणक में आप लोग देखेंगे कि जो मूर्ति है वह भगवान बन जाएगी। यह पाषाण से भगवान की यात्रा है, जो मूर्ति पाषाण से भगवान बन सकती है तो हम अपनी चेतना का उत्थान कर आत्मा से परमात्मा बन सकते हैं।

ईश्वरीय तत्व को पाने के लिये पुरुषार्थ करना होगा

मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रों में विधान है कि इस मूर्ति के कान में हम मंत्र फंूकेंगे तो मूर्ति भगवान बन जाएगी लेकिन, एक भी ऐसा विधान नहीं है कि हम आपके कानों में मंत्र फूंकें और तुम इंसान बन जाओ। अगर ऐसा होता तो हम प्रवचन के स्थान पर सभी को पकडकर कानों में मंत्र फूंकते, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी प्रत्येक आत्मा परमात्मा बन सकता है। मुनि श्री ने कहा उस ईश्वरीय तत्व को पाने के लिये पुरुषार्थ करना होगा। इस अवसर पर निर्यापक मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज ने कहा कि तत्वार्थ सूत्र में पांच प्रकार के ज्ञान बताए है। मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, परोक्ष है

और अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञान ये प्रत्यक्ष है। इसके अलावा कोई भी ज्ञान प्रमाण नहीं है।

हम दो संघ नहीं सभी एक ही गुरु के शिष्य 

उन्होंने कहा कि हम दो संघ नहीं सभी एक ही गुरु के शिष्य हैं। राग से वैराग्य की इस यात्रा को हम सभी मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज के सानिध्य में इस पंचकल्याणक महामहोत्सव को संपन्न कराएंगे। इस अवसर पर मुनिश्री शीतलसागरजी महाराज ने कहा कि मुनि श्री से हमारा विदिशा प्रवास में 1992 से कनेक्शन है। हमें उनकी 10 माह तक सेवा करने का अवसर मिला था और जब मुनि श्री का आदेश बुढा़र में आने का मिला तो मना करने का प्रश्न ही नहीं उठता था।

धर्म का वास्तविक अर्थ अपने भीतर के विकारों को पहचानना 

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रमाण सागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों के माध्यम से धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रखकर उसे व्यवहारिक जीवन से जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि धर्म का वास्तविक अर्थ अपने भीतर के विकारों को पहचानना और उन्हें जीतना है। उनकी वाणी में गहराई भी है और सरलता भी है तभी तो इतने जटिल दार्शनिक विषयों को इतने सहज ढंग से समझाते हैं। सामान्य व्यक्ति भी आत्मा, कर्म और मोक्ष जैसे गूढ़ विषयों को समझ सके। मुनि श्री ने सदैव युवाओं को नैतिकता,अनुशासन और चरित्र निर्माण की प्रेरणा दी है।

2 मार्च तक चलेगा महोत्सव

मुनि संघ के प्रवक्ता अविनाश जैन एवं न्यास के प्रचार मंत्री गौरव नारद ने बताया मुनिश्री का कहना है कि आधुनिकता को अपनाइए, परंतु अपनी संस्कृति और संस्कारों को मत छोड़िए। उन्होंने हमेशा इस बात पर बल दिया कि क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह ही मनुष्य के वास्तविक शत्रु हैं। यदि व्यक्ति इन दोषों का ेजीत लंे तो संसार में कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता। 25 फरवरी से 2 मार्च तक श्री शांतिनाथ जिनालय के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव प्रारंभ होने जा रहा है। प्रातःकाल घटयात्रा मुनिसंघ के सानिध्य में प्रारंभ होगी, जो कि नगर परिक्रमा के साथ कार्यक्रम स्थल पर पहुंचेगी। ध्वजारोहण एवं मंडल उदघाटन के साथ मंडप शुद्धि एवं पात्र शुद्धि के साथ पंचकल्याणक की मांगलिक क्रिया प्रतिष्ठाचार्य अशोक भैया एवं अभय भैया, सह प्रतिष्ठा चार्य अमितशास्त्री के निर्देशन में होगी।

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