आचार्यश्री विशुद्धसागर जी महाराज इन दिनों इंदौर सुमतिधाम में होने जा रहे पट्टाचार्य महोत्सव के लिए सिद्धवरकूट में पंचकल्याणक महोत्सव संपन्न करवाकर विहार कर रहे है। उनके साथ मुनियों का संघ और संघपति भी विहार कर रहे हैं। वे जहां भी विश्राम करते हैं। अपनी देशना में अमूल्य वचन से उपकृत करते हैं। इंदौर से पढ़िए अभिषेक पाटील की यह खबर…
इंदौर। आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज जी ने कहा कि सागर की गहराई और पर्वत की ऊंचाई जगत प्रसिद्ध है पर इनसे भी गहरा और ऊंचा कोई है तो वह गुरु का धर्म उपदेश है। गुरु के वचन आत्मा को परमात्मा के पास पहुंचाने के साधन है। भगवान महावीर की मुद्रा ही नग्न मुनियों की मुद्रा है। गुरु भक्ति की महिमा अपरंपार है। जैन समाज के लोगों ने जैन धर्म को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा धर्म का अनुसरण किया है। श्रुत अभ्यास और आगम का ज्ञान जरूरी है। सभी युवाओं को अच्छी धर्म प्रभावना और साधु का आदर सत्कार करना चाहिए। जो दूसरों से छल करते हैं, जो दूसरों को धोखा देते हैं, जो दूसरों को गिराने के लिए गड्ढा खोदते हैं, वे एक दिन स्वयं ही उस गड्ढे में गिर जाते हैं। यदि तुम शांति चाहते हो, तो दूसरों को भी शांति से जीने दो। आप दूसरों से सम्मान चाहते हो, तो सभी का सम्मान करो। सज्जन मानव ही सज्जनता से जीता है।
धर्म का उपदेश, हितकारी गुरुओं की वाणी वही श्रद्धापूर्वक सुन सकता है, जिसकी भवावलियाँ अल्प हैं। सोते हुए को पानी के छींटे मारकर जगाया जा सकता है, परन्तु सोने का नाटक करने वाले मानव को नहीं जगाया जा सकता है। कुछ पाना है, तो देना सीखो। जो झुक जाता है, वह उठ जाता है। गगन-सी ऊंचाईयां चाहिए तो नम्रता सीखो। मधुर भाषण, विनयशीलता, उच्च कुलीन मानवों की कुल विद्या है।













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