सकल जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय प्रवचनमाला के प्रथम दिवस पर राष्ट्रसंत श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को क्रोध संयम, क्षमा और सकारात्मक जीवन जीने की कला सिखाई। सनावद से पढ़िए, सन्मति जैन काका की यह खबर…
सनावद। सकल जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय प्रवचनमाला के प्रथम दिवस पर राष्ट्रसंत श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को क्रोध संयम, क्षमा और सकारात्मक जीवन जीने की कला सिखाई। महाराज जी ने कहा कि क्रोध बाहर से नहीं आता। हम खुद अपने भीतर पैदा करते हैं। विवेक चला जाए तभी गुस्सा आता है। महाराज जी ने प्रवचन में जोर देकर कहा कि स्वर्ग उन्हीं के लिए है, जो अपने गुस्से पर काबू रखते हैं और दूसरों की गलतियों को माफ कर देते हैं। उन्होंने व्यावहारिक संकल्प सुझाते हुए कहा कि पहला संकल्प लो कि क्रोध नहीं करेंगे। गुस्से का बहाना मत ढूंढो, बल्कि गुस्सा न करने का बहाना ढूंढो।
क्रोध पर विजय के सरल सूत्र
महाराज जी ने क्रोध नियंत्रण के कुछ आसान नियम बताए। सुबह आंख खुलते ही गुस्सा न करें। घर से बाहर जाते या अंदर आते समय मुंह फुलाकर न आएं। भोजन, शयन या बातचीत के समय कभी क्रोध न करें। गुस्सा केवल सुधार के लिए जायज है, अन्यथा नहीं।
क्षमा और मुस्कान की महिमा
महाराज जी ने क्षमा को सबसे बड़ा गुण बताते हुए कहा कि एक ‘सॉरी’ कह देने से बड़े-बड़े विवाद खत्म हो जाते हैं। उन्होंने मुस्कान पर जोर देते हुए दृष्टांत दिया कि फोटो खिंचवाते समय 3-4 सेकंड मुस्कुराते हैं तो फोटो सुंदर आता है। यदि यही मुस्कान हमेशा चेहरे पर रहे तो जिंदगी कितनी सुंदर हो जाएगी।
उन्होंने सलाह दी कि हमेशा मुस्कुराते रहें, जिससे भी बात करें मुस्कुराकर करें। मोबाइल पर बात करते समय भी गुस्सा न करें। भगवान उन्हीं से प्रेम करते हैं, जो दूसरों के प्रति दयावान होते हैं।
सही नजरिए से देखें तो दुख भी सुख लगेगा
इससे पूर्व डॉ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागर जी ने कहा कि परमात्मा ने सांसें दी हैं, इसलिए जीवन को आनंद से जिएं। संसार में सम्मान-अपमान दोनों हैं, विपत्ति आए तो आपत्ति न करें। उन्होंने उदाहरण दिया कि दूध फट जाए तो निराश वही होता है जो रसगुल्ला बनाना नहीं जानता। मुनिश्री ने सम्यक दृष्टि पर बल देते हुए कहा कि सही नजरिए से देखें तो दुख भी सुख लगेगा गलत नजरिए से सुख भी दुख। कार्यक्रम में भागचंद जैन और अनिता जैन को उनकी सामाजिक सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। नगर अध्यक्ष अनिता जैन ने गुरुवंदना की, जबकि आभार भागचंद जैन ने व्यक्त किया। इस अवसर पर नगर के सभी श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। यह प्रवचनमाला जैन समाज में क्रोध-क्षमा जैसे विषयों पर आत्म-सुधार का मजबूत संदेश दे रही है, जो आज के तनावपूर्ण जीवन में बेहद प्रासंगिक है।













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