समाचार

भगवान वासुपूज्यस्वामी का ज्ञान कल्याणक 20 जनवरी को: तिथि के अनुसार माघ शुक्ल द्वितीया को है 


जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी का ज्ञान कल्याणक मंगलवार को मनाया जा रहा है। भगवान वासुपूज्य स्वामी को माघ शुक्ल द्वितीया को आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस दिन भगवान का ज्ञान कल्याण दिगंबर जैन मंदिरों और चैत्यालयों में भक्तिपूर्ण वातावरण में श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह विशेष संकलित जानकारी…


इंदौर। जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी का ज्ञान कल्याणक मंगलवार को मनाया जा रहा है। भगवान वासुपूज्य स्वामी को माघ शुक्ल द्वितीया को आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस दिन भगवान का ज्ञान कल्याण दिगंबर जैन मंदिरों और चैत्यालयों में भक्तिपूर्ण वातावरण में श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। जैन धर्म के ग्रंथों और आगम में वर्णित जानकारी के अनुसार पीटरहार्द द्वीप के पूर्व मेरू की ओर सीता नदी के दक्षिणी तट पर वत्सकावती नाम का देश है। उनका अतिशय प्रसिद्ध रत्नपुर नगर में पद्मश्री नाम का राजा राज्य था। तीर्थंकर नामकर्म का बंधन करके दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं की प्रतिज्ञा करके चार अन्य का अध्ययन किया गया। जिससे महाशुक्र विमान में महाशुक्र नाम का इंद्र आया।

गर्भ और जन्म

इस जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में चंपानगर में ‘अंग’ नाम का देश है। जिसका राजा वसुपूज्य था और रानी जयावती थी। आषाढ़ कृष्ण षष्ठी के दिन रानी ने पूर्वाेक्त इंद्र को गर्भ में धारण किया और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन पुण्यशाली पुत्र को उत्पन्न किया। इंद्र ने जन्म उत्सव करके पुत्र का ‘वासुपूज्य’ नाम रखा। जब कुमार काल के पूर्ववर्ती लाख वर्ष बीत गए, तब संसार से विरक्त होकर भगवान जगत के यथार्थ स्वरूप का विचार करने लगे। तत्क्षण ही देवों के आगमन हो जाने पर देवों द्वारा निर्मित पालकी पर सवार होकर मनोहर नामक उद्यान में गए और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन छह सौ छिहत्तर राजाओं के साथ स्वयं दीक्षित हो गए।

केवल ज्ञान और मोक्ष

छद्मस्थ अवस्था का एक वर्ष बीत जाने पर भगवान ने कदंब वृक्ष के नीचे बैठकर माघ शुक्ल द्वितीया के दिन सायंकाल में केवल ज्ञान को प्राप्त कर लिया। भगवान बहुत समय तक आर्यखंड में विहार कर चंपानगरी में आकर एक वर्ष तक रहे। जब आयु में एक माह शेष रह गया। तब योग निरोध कर रजतमालिका नामक नदी के किनारे की भूमि पर वर्तमान चंपापुरी नगरी में स्थित मंदारगिरि के शिखर को सुशोभित करने वाले मनोहर उद्यान में पर्यंकासन से स्थित होकर भाद्रपद चतुर्दशी के दिन चौरानवे मुनियों के साथ मुक्ति को प्राप्त हुए।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shree Phal News

About the author

Shree Phal News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page