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संस्कार ही भविष्य की दिशा तय करते हैं : मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने बच्चों को प्रारंभ से ही धार्मिक संस्कार देने पर दिया जोर


हिरनई गांव में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति इसलिए हावी हो रही है, क्योंकि हम बच्चों को संस्कार देना तो चाहते हैं लेकिन, स्वयं वैसा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाते। हिरनई से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


  हिरनई। हिरनई गांव में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति इसलिए हावी हो रही है, क्योंकि हम बच्चों को संस्कार देना तो चाहते हैं लेकिन, स्वयं वैसा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों के हृदय में प्रारंभ से ही धर्म के संस्कार दिए जाएं तो उनके भटकाव की संभावनाएं अत्यंत कम हो जाती है।

मुनि श्री ने समझाया कि छोटे बच्चों का मन धर्म और पूजा-पाठ में स्वाभाविक रूप से लगता है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं। पढ़ाई, करियर और प्रतिस्पर्धा की ओर ध्यान बढ़ जाता है। ऐसे में प्रारंभिक दिनों में दिए गए अच्छे संस्कार ही दिशा-सूचक दीपक बनते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कभी बच्चे भटक भी जाएं तो संस्कार उन्हें वापस सही मार्ग पर ले आते हैं। इसलिए पाठशालाओं और अन्य माध्यमों से संस्कार देना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि, धार्मिक संस्कार जीवन का मूल तत्व हैं। मुनि श्री ने बच्चों के लिए सरल संदेश दिया और कहा कि धर्म भले कम करो, लेकिन अधर्म से अवश्य बचो। यदि पीढ़ी अधर्म से बचेगी तो वही सबसे बड़ा धर्म कहलाएगा। बच्चों को जीवन की मर्यादा समझाना और सही–गलत का विवेक देना ही माता-पिता का सच्चा धर्म है।

मंदिर तो सुंदर बन गया, मन को मंदिर कैसे बनाएं? 

मुनि श्री ने कहा कि जैसे आस्था ने भगवान का सुंदर मंदिर बनाया है उसी आस्था को भीतर जगाएं तो मन भी मंदिर बन जाएगा। धर्मसभा में मुनि श्री संधानसागर जी महाराज ने शंका-समाधान कार्यक्रम का संचालन किया। उपस्थित श्रावकों ने अपने व्यावहारिक जीवन, धर्म और आस्था से जुड़े प्रश्न रखे। जिनका समाधान मुनि श्री ने अत्यंत सहजता और स्पष्टता से किया।

मंगल विहार अटारी खैजड़ा गांव की ओर हुआ

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातःकालीन बेला में लाल पाषाण से निर्मित दिव्य जिनालय में मुनि श्री के मुखारबिंद से शांतिधारा हुई इसके बाद विश्वविख्यात शंका-समाधान कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। वातावरण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भगवान के समवशरण में इंद्रभूति गौतम अपने प्रश्न रख रहे हों और समाधान मिल रहा हो। इस अवसर पर विदिशा, गंजबासोदा, भोपाल, सागर और राहतगढ़ से आए श्रावकों ने भी अपने प्रश्न रखकर समाधान पाया। दोपहर बाद मुनि श्री का मंगल विहार अटारी खैजड़ा गांव की ओर हुआ।

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