मुरैना के बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोक सागरजी ने प्रवचन में कहा कि इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्म संयम ही उत्तम तप धर्म है। पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी पर नगर के प्रत्येक जैन परिवार से पूजन की थाली भेजी जाएगी। पढ़िए मनोज जैन की खास रिपोर्ट…
मुरैना। पर्यूषण पर्व में बड़े जैन मंदिर में दसलक्षण धर्मों पर प्रवचन श्रृंखला जारी है। इसी क्रम में दिगंबर संत मुनिश्री विलोक सागरजी महाराज ने उत्तम तप धर्म पर व्याख्यान देते हुए कहा कि अपने मन, विकारों और भावनाओं पर नियंत्रण ही वास्तविक तप है। इच्छाओं का निरोध करना ही तप है। इंद्रिय विषयों पर विजय प्राप्त कर धैर्य और संयम के साथ पुरुषार्थ करना तप का सार है। मुनिश्री ने कहा कि तप केवल शारीरिक कष्ट नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धि और चित्त की निर्मलता के लिए साधना है। ध्यान, उपवास, संयम और योग से मनुष्य अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़ सकता है। भगवान महावीर को भी केवलज्ञान कठोर तपस्या के बाद ही प्राप्त हुआ था।
तप साधना का महत्व समझाया
उन्होंने समझाया कि तप का उद्देश्य ऊर्जा प्राप्त करना ही नहीं बल्कि उसका संयमित उपयोग करना है। तप साधना से मनुष्य अपनी इंद्रियों को वश में कर आत्मशक्ति का जागरण करता है। अनंत चतुर्दशी पर नगर के सभी जैन परिवार पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़े मंदिर को अष्टद्रव्य की थाली भेजेंगे। इसमें चावल, गोला, लौंग, इलायची, बादाम, केशर और छुहारे जैसी सामग्री होगी, जिनसे पूरे वर्ष पूजन-अर्चन किया जाएगा।
सामाजिक परंपरा के अनुसार, हर घर से आने वाली थाली से तैयार सूची ही मंदिर प्रबंध समिति के चुनाव की आधार सूची बनती है। प्रत्येक तीन वर्ष बाद इसी से मंदिर की नई प्रबंध समिति का गठन होता है।













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