दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 153वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“रिद्धि सिद्धि मांगो नहीं, मांगो तुम पै येह,
निसि दिन दर्शन साधु को, प्रभु कबीर कहूं देह॥”
संत संग की साधना: कबीर की मांग
कबीर अपने इस दोहे में सांसारिक इच्छाओं और आध्यात्मिक आकांक्षाओं के बीच के फर्क को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि प्रभु से रिद्धि-सिद्धि, यश, वैभव, या चमत्कारिक शक्तियाँ मत माँगो — ये सब माया के जाल हैं, जो आत्मा को परमात्मा से दूर कर सकती हैं।
कबीर की एक ही सच्ची मांग है:
नित्य संत दर्शन की सौभाग्यशाली देह।
क्योंकि वे जानते हैं कि आत्मोन्नति, विवेक, और ईश्वर के साक्षात्कार का मार्ग संत-संगति से ही खुलता है। संतों का जीवन, उनका आचरण, उनका विचार — यही सच्चे धर्म की प्रेरणा है।
इस दोहे में कबीर केवल भक्ति की बात नहीं करते, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी देते हैं —
आज समाज में पद, धन, और दिखावटी सफलता को ऊँचा स्थान मिल गया है,
जबकि सरलता, संयम और सदाचार को नजरअंदाज किया जा रहा है।
कबीर हमें जगाते हैं —
ईश्वर से माँगो, तो ऐसी देह माँगो,
जो संतों के विचारों को आत्मसात कर सके।
यह दोहा हमें सिखाता है कि सच्चा भक्ति-मार्ग शक्ति या सिद्धि नहीं,
साधु-संग, सत्य-जीवन और ईश्वर की निकटता है।













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