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आचार्य श्री आचार्य श्री प्रज्ञा सागर महाराज के सानिध्य में निकली पदयात्रा : मिथुन मित्तल के मुख्य संयोजन में ऐतिहासिक और भव्य बनी पदयात्रा 


आचार्य श्री 108 प्रज्ञा सागर महाराज सानिध्य में कोटा से स्वास्तिधाम तक निकली जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा जो जिनशासन की प्रभावना के साथ हरित क्रांति का संदेश भी दे गई। मिथुन मित्तल का संयोजन अविस्मरणीय जो पदयात्रा कभी न भूले जाना वाला पल बन गई। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री 108 प्रज्ञा सागर महाराज सानिध्य में कोटा से स्वास्तिधाम तक निकली जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा जो जिनशासन की प्रभावना के साथ हरित क्रांति का संदेश भी दे गई। मिथुन मित्तल का संयोजन अविस्मरणीय जो पदयात्रा कभी न भूले जाना वाला पल बन गई। कोटा से स्वास्तिधाम जहाजपुर तक निकली पदयात्रा ऐसी पदयात्रा बन गई जो अविस्मरणीय है। जो इस भव्य अलौकिक पदयात्रा में सम्मिलित हुए उनका कहना है कि इतनी अलौकिक पदयात्रा हुई जिसे हम भुला नहीं पाएंगे। जितने भी भक्त इस यात्रा में शामिल हुए। उन्होंने मिथुन मित्तल के मुख्य संयोजन की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह गुरुदेव की आशीष का ही प्रताप रहा कि हमें पैदल चलने के बाद भी थकान नहीं रही। मित्तल की टीम की तारीफ करते हुए कहा कि उनकी तन-मन-धन से निष्ठा समर्पण विनम्रता एक प्रेरणा है और कहा कि ऐसे युवाओं की आज समाज को महती आवश्यकता है। पूरी पदयात्रा में हम पैदल चल रहे थे। आमतौर पर होता है कि हम पैदल चलते हैं। थकान महसूस करते लेकिन, यह पदयात्रा तो दोहरा पुण्य क्षण प्रदान कर गई। हम भक्ति नृत्य करते हुए चले लेकिन, हमें थकान तक महसूस नहीं हुई। भोजन आवास की व्यवस्थाएं बिल्कुल शादी समारोह जैसी की गई। जिस भी स्थान पर पदयात्रा रुकती वह किसी धर्मशाला आदि में नहीं उसकी व्यवस्था रिसोर्ट आदि में की गई। मित्तल परिवार की ओर से रामगंजमंडी से एक बस इस पदयात्रा में शामिल होने के लिए लगाई गई।

 मेरा अनुभव 

यह मेरे लिए दुर्लभ क्षण थे कि पदयात्रा जहाजपुर कस्बे से स्वास्तिधाम तक गई में उन क्षणों का साक्षी बना। आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी स्वयं संघ सहित आचार्य श्री की अगवानी के लिए कस्बे में आईं। यह मिलन एक दिव्य मिलन बन गया, जो विनय संपन्नता का जीवंत उदाहरण बन गया। जगह-जगह स्वागत द्वार कस्बा तोरण द्वार से अटा रहा। ऐसा दिव्य स्वागत अगवानी जो कीर्तिमान कही जा सकती है। लगभग़ 5 किमी की पैदल पदयात्रा में गुरु मा भी संघ सहित रही। भक्ति में झूमते भक्त ऐसा लग रहा था। जैसे साक्षात समवशरण आया हो। मुझे भी भक्ति करने गुरु के साथ चलने का अवसर मिला, जो भक्त इस अवसर को ले पाए। वह सौभाग्यशाली एवं पुण्यशाली है। सत्य कहा है किसी ने वे लोग निराले होते जिन्हें बाबा बुलाते है वे लोग निराले होते हैं, जिन्हें गुरुओं के संघ पैदल चलकर गुरु का आशीष एवम भगवान का दरबार मिलता है। वह भी अतिशय क्षेत्र पर निश्चित रूप से रामगंजमंडी नगर को कुशल संयोजन कर मिथुन मित्तल ने गौरव से भर दिया।

 स्वस्तिधाम तीर्थ पर भव्य आगवानी 

जैसे ही यह पदयात्रा क्षेत्र के प्रवेश द्वार पर आई महिला शक्ति ने मंगल कलश लिए गुरुदेव की अगवानी की एवम क्षेत्र कमेटी ने भी आगवानी ऐसी दिव्य भव्य अलौकिक आगवानी हुई जो क्षेत्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जाएगी। आचार्य श्री प्रज्ञा सागर महाराज ने बाबा मुनिसुव्रतनाथ एवम जिनालय के दर्शन किए। उसके बाद यह पदयात्रा धर्म सभा में परिवर्तित हो गई। इस अवसर पर मां स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि जिनधर्म की प्रभावना में आचार्य श्री का बहुत बड़ा योगदान है। पुरानी स्मृति को बताते हुए गुरु मां ने कहा कि मेरा गुरुदेव से जबसे संबंध है। जब यह ब्रह्मचारी अवस्था में विवेक भैया के रूप में थे और में उस समय बहुत छोटी थी। उन्होंने कहा कि जहां सागर होते हैं। वहां सागर बन ही जाता है। इसलिए भक्तों का सागर यहां आया है। आचार्य श्री के विषय में कहा कि जो सरल होता है, वह तरल होता है जो तरल होता है। वह बहता हुआ होता है और जो बहता हुआ होता है वह शुद्ध होता है। आचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज ने प्रज्ञा सागर नाम बहुत सोच समझ के रखा है। उनका गृहस्थ अवस्था का नाम विवेक जो विवेक का अर्थ प्रज्ञावान होता है। आचार्य श्री प्रज्ञा सागर महाराज प्रज्ञावान है कि उन्होंने साधना द्वारा ऊंचाइयों को छुआ है, जो अनुकरणीय है, उतारने योग्य है उन्हें देखकर सुनकर शिक्षा ले। बाबा मुनिसुव्रतनाथ के समक्ष हुई धर्मसभा में आचार्य श्री 108 प्रज्ञा सागर महाराज ने स्वास्तिधाम क्षेत्र के विषय में बोलते हुए कहा कि यह एक ऐसा क्षेत्र है जो अल्पकाल में विश्व विख्यात हो गया। उन्होंने माता जी की तारीफ करते हुए कहा कि स्वस्तिभूषण माताजी सौभाग्यशाली है। जिन्हें भगवान ने अपने लिए बुलाया और यहां स्थापना करवाई। वर्तमान में आर्यिका माताजी बहुत है लेकिन उसमें सबसे सौभाग्यशाली माताजी रही। बाबा के चरणों में बैठने देखने का अद्भुत आनंद है। पुरानी स्मृति को बताते हुए उन्होंने कहा कि बचपन में इन्होंने मुझे ब्रह्मचारी अवस्था में देखा लेकिन किसे पता था कि संगीता स्वस्तिभुषण माताजी बनेगी। प्रभावना के विषय में आचार्य श्री ने कहा कि धर्म की

प्रभावना पिच्छिधारी साधुओं से होती है। मेने आह्वान किया इसीलिए लोग पदयात्रा में आए और पैदल चले। उन्होंने कहा मैं तो बहुत आनंदित हूं स्वस्तिधाम आकर मुनिसुव्रत भगवान के दर्शन करके और बहुत आनंदित हूं आप सभी को देखकर

शनिवार की बेला में हुआ पदयात्रा का समापन 

आचार्य श्री प्रज्ञा सागर महाराज सानिध्य में निकली पदयात्रा का समापन शनिवार की बेला में हो गया। प्रातःश्रीजी का अभिषेक शांतिधारा हुई। उसके उपरांत आहारचर्या हुई। उसके उपरांत समापन समारोह प्रारंभ हुआ। जिसमें दीप प्रज्वलन, चित्र अनावरणऔर मंगलाचरण हुआ एवं पदयात्रा में विशेष सहयोग देने वाले भक्तों का सम्मान किया गया। इसके उपरांत आसपास के क्षेत्र से आए भक्तों ने श्रीफल भेंटकर गुरुवर से अपने-अपने स्थान पर आने का निवेदन किया। आचार्य श्री ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि आप लोगों ने जहाजपुर पदयात्रा में स्वर्ण कलश बनकर इसे पूर्णता प्रदान की है।

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