दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -163 सच बोलो चाहे वो कड़वा ही क्यों न हो : धर्म का मूल आधार प्रेम और सत्य है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 163वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“प्रेम प्रीति का चालना, पहिरि कबीरा नाच।

तन मन तापर वारहूं, जो कोई बोलै सांच॥”


कबीर इस दोहे में स्पष्ट करते हैं कि धर्म केवल विधि-विधान या कर्मकांड नहीं है,

बल्कि उसका मूल आधार प्रेम और सत्य है।

यदि भक्ति में प्रेम नहीं,

और जीवन में सत्य नहीं,

तो ऐसा धर्म केवल दिखावा है।

कबीर कहते हैं—

मुझे वह व्यक्ति श्रेष्ठ प्रतीत होता है,

जो बिना डरे, बिना झूठ बोले,

केवल सत्य बोलता है—

चाहे वह सामाजिक रूप से छोटा ही क्यों न हो।

इस दोहे के माध्यम से कबीर मूल्य-आधारित जीवन का चित्र प्रस्तुत करते हैं।

आज का समाज दिखावे, चालाकी और चापलूसी की ओर बढ़ रहा है।

लोग “सच” से डरते हैं, और “प्रेम” को स्वार्थ से बदल चुके हैं।

आज की दुनिया बनावटी छवियों, प्रचारित प्रेम और

छलपूर्ण संबंधों से भरी हुई है।

कबीर समाज को ललकारते हैं—

“जो सच बोले, भले ही वह कड़वा हो,

वही सच्चा है। और मैं उस पर अपना तन-मन वारने को तैयार हूँ।”

 

कबीर स्वयं को ऐसे प्रेम का नाचता हुआ प्रतीक मानते हैं—

जहां हृदय से छल हट चुका है,

और भक्ति केवल आनंदमयी उत्सव बन गई है।

प्रेम और सत्य — ये दो दीपक हैं,

जिनके प्रकाश में आत्मा नृत्य करती है,

और परमात्मा प्रसन्न होता है।

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