युगों-युगों तक भव्यजीवों के दुख-संकटों को दूर करती रहेगी आचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज की चरण छत्री यह उद्बोधन आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने दिए। आचार्य श्री विरागसागर जी की चरणछत्री का शिलान्यास हुआ। सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…
सहारनपुर। नगर में आचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज का समाधिस्थल चरणछत्री बनने जा रही है। यहां के जैन बाग वीरनगर में श्री 1008 महावीर जिनालय प्रांगण में आचार्य श्री के समाधि स्थल के रूप में चरण छत्री की स्थापना की जाएगी। विजयादशमी के शुभ दिवस प्रातः काल में आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज (ससंघ 30 पिच्छी) के सान्निध्य में आचार्य श्री की चरणछत्री का भव्य शिलान्यास समारोह किया गया। शिलान्यास करने का सौभाग्य पंचान समिति के उपाध्यक्ष एवं स्वागताध्यक्ष विपिन जैन (चाँदी वाले) सपरिवार को प्राप्त हुआ। जैन समाज के अध्यक्ष राजेश जैन ने बताया कि गुरुवर की तीनों चरण छत्रियों का निर्माणकार्य शीघ्रातिशीघ्र प्रारंभ होकर पूर्णता को प्राप्त होगा। प्रातःकालीन शिलान्यास समारोह में उपस्थित श्रद्धालु भक्तों ने भी शिलायें रखकर अपने सौभाग्य को वर्धित किया। उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री विमर्शसागर जी मुनिराज जिस पवित्र स्थान से भव्य जीव सिद्धत्व को प्राप्त करते हैं। वह सिद्धभूमि – सिद्धक्षेत्र कहलाता है और जहाँ रत्नत्रय धारी निर्ग्रन्य मुनिराजों की समाधि संस्कार होता है। वह स्थान निषद्या स्थल कहलाता है। इस निषद्या-स्थल की शास्त्रों में आचार्य भगवंतों ने बड़ी महिमा बतायी है। आपके जीवन में आने वाले विघ्नों को नाश करने वाले यह निषद्यास्थल हुआ करते हैं। यह स्थान अत्यंत पूजनीय और पवित्र होते हैं। आचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज की जीवन भर की सर्वाेत्कृष्ट साधना का फल सर्वाेत्कृष्ट समाधि के रूप में हम सबके सामने आया।
पुण्य तो सब जीव लेकर आते हैं कोई पुष्य का भोग करता है तो कोई पुण्य का साधना में उपयोग करता है, साधक के जीवन के अंत की समाधि यह बता देती है कि साधक ने पुण्य का भोग किया है या साधना में उपयोग किया है। आचार्य गुरुवर सर्वश्रेष्ठ साधक थे और गुरुवर ने सर्वाेत्तम समाधि साधकर आगामी श्रमण संस्कृति के लिए आदर्श प्रस्तुत कर दिया है जो युगों-युगों तक साधकों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। ऐसे युग के सर्वश्रेष्ठ आचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज का यह समाधिस्थल चरणछत्री भव्य जीवों के आत्मकल्याण और दुःख -संकटों को दूर करने साधन बनती रहेगी।













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