दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 101वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“जाके जिव्या बंधन नहीं, ह्रदय में नहीं साँच।
वाके संग न लागिए, खालै वटिया कांच॥”
कबीरदास जी इस दोहे में कहते हैं कि जिस व्यक्ति की जिह्वा पर संयम नहीं है — जो बात-बात में झूठ बोलता है, छल करता है, और जिसका ह्रदय सच्चा नहीं है — ऐसे व्यक्ति की संगति से बचना चाहिए। उसकी संगति से हानि हो सकती है, क्योंकि वह भीतर से खोखला होता है। जैसे खाल (चमड़े) से बनी कांच जैसी रस्सी मज़बूत नहीं होती, वैसे ही ऐसे व्यक्ति का साथ भी टिकाऊ या भरोसेमंद नहीं होता।
इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी यह स्पष्ट करते हैं कि धर्म का मूल तत्व केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि भीतरी सच्चाई, पवित्रता और प्रेम है। यदि कोई व्यक्ति धार्मिकता का दिखावा करता है, लेकिन उसके ह्रदय में सत्य और करुणा नहीं है, तो वह सच्चे धर्म के मार्ग पर नहीं है। ऐसे ढोंगी धर्मात्माओं से दूरी बनाना ही श्रेयस्कर है।
समाज में अक्सर ऐसे लोग मिलते हैं जो ऊपर से सज्जन, प्रभावशाली या धार्मिक दिखते हैं, परंतु भीतर से कपटी होते हैं। कबीरदास जी सामाजिक चेतावनी देते हैं कि ऐसे असत्याचारी व्यक्तियों का संग न केवल व्यक्तिगत हानि पहुंचा सकता है, बल्कि समाज में भी अशांति और अविश्वास फैला सकता है।
इसलिए, अच्छे समाज की नींव सत्यनिष्ठ, सच्चरित्र और निःस्वार्थ लोगों की संगति पर टिकी होती है। यह दोहा साधकों को भी सचेत करता है कि यदि कोई गुरु या साधक बाहरी रूप से धार्मिक प्रतीत होता है, परंतु आंतरिक रूप से सच्चा नहीं है, तो उसकी संगति आत्मिक विकास के लिए बाधक बन सकती है।
अतः आध्यात्मिक यात्रा में सच्चे ह्रदय, संयमित वाणी और निष्कलंक आचरण वाले संतों का ही साथ करना श्रेयस्कर होता है।













Add Comment