Tag - पुरुषार्थ

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सद्गृहस्थ के चित्त की स्थिरता में वित्त की स्थिरता अनिवार्य : प्रकृति का नियम है कि जो निरंतर गतिशील है वही जीवित है

भारतीय मनीषा के इस यथार्थपरक श्लोक में जीवन का वह नग्न सत्य प्रतिध्वनित होता है, जिसे समाज प्रतिदिन देखता तो है, किंतु स्वीकार करने में संकोच करता है। संसार का...

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मुनि श्री विलोकसागर ने कहा प्राणी को कर्म ही तारता और मारता है: धर्मसभा में मुनिश्री ने कर्म की प्रबलता का संदेश दिया

मुनिश्री विलोकसागर जी ने कर्म, भाग्य, पुरुषार्थ और भाव नियंत्रण के बारे में प्रवचन के दौरान श्रावकों को उपदेश दिए। वे मुरैना के बड़ा जैन मंदिर में धर्मसभा को...

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