भाव विशुद्धि युक्त अनुराग ही भक्ति है। इसमें व्यक्ति सबकुछ भूलकर गुरु का हो जाता है। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में शीतलधाम...
भाव विशुद्धि युक्त अनुराग ही भक्ति है। इसमें व्यक्ति सबकुछ भूलकर गुरु का हो जाता है। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में शीतलधाम...
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