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भगवान को जानने के लिए ज्ञान की आंखें खुलना जरूरी - श्री स्वस्तिभूषण माताजी : सोमवार को श्रीजी की निकलेगी भव्य शोभायात्रा, विश्वशांति के लिए महायज्ञ


जिसकी ज्ञान की आंखें, सत्य की आंखें खुल जाती हैं, उन्हें भगवान में गुण ही गुण दिखते हैं। जिनकी सत्य की आंखें न खुली हों, वह भगवान को मानते तो हैं, पर जानते नहीं हैं। जैसे जन्म के समय आँखें तो होती हैं लेकिन देखने की क्षमता नहीं होती । बुढ़ापे में आँखें तो कमजोर हो जाती हैं पर जानने की क्षमता बढ़ जाती है। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…


मुरैना। संसार में कोई शरीर से आकर्षित होता है और कोई कला से। कोई धन से आकर्षित होता है, कोई आवाज से। जो जिस चीज से आकर्षित होता है उसे वही सही लगता है। जो सही होता है वह सही नहीं लगता। जो आकर्षित करता है, वह सही लगता है जिसमें गुण दिखते है, उससे मिलने का प्रयास करते हैं। लेकिन जिसकी ज्ञान की आंखें, सत्य की आंखें खुल जाती हैं, उन्हें भगवान में गुण ही गुण दिखते हैं। जिनकी सत्य की आंखें न खुली हों, वह भगवान को मानते तो हैं, पर जानते नहीं हैं।

जैसे जन्म के समय आँखें तो होती हैं लेकिन देखने की क्षमता नहीं होती । बुढ़ापे में आंखें तो कमजोर हो जाती हैं पर जानने की क्षमता बढ़ जाती है। यह उद्गार हैं जैन साध्वी गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी के। उन्होंने जैन बगीची में चल रहे श्री सिद्धचक्र महामण्डल विधान के सातवें दिन धर्मसभा में यह प्रवचन दिए। सोमवार को विधान के समापन अवसर पर विश्वशांति के लिए महायज्ञ होगा। श्रीजी को रथ में विराजमान कर भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी।

विधान के सातवें दिन पूज्य गुरुमां ने बताया कि 1008 गुणों के कारण ही भगवान के नाम के सामने 1008 लिखा जाता है। सिद्धचक्र विधान में उन्हीं 1008 गुणों के अर्घ समर्पित किए गए हैं। समवशरण में सौधर्म इंद्र 1008 नाम बोलकर भगवान की भक्ति करता है। उन नामों को आचार्यों ने लिपिबद्ध किया है। सिद्धों की भक्ति में यही अर्घ चढ़ाए गए हैं। जिसको जिससे प्रेम होता है वह उसकी प्रशंसा करता है। भगवान को देखने समझने के लिए मोह रहित ज्ञान की आंखें चाहिए ।

भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी देवीराम उपाध्याय ने पूज्य गुरुमां श्री स्वस्तिभूषण माताजी को श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद प्राप्त किया। श्री उपाध्याय ने पूज्य जैन साध्वी को सभी जनहितैषी कार्यो में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। आपने विधान में ग्यारह हजार रुपए के सहयोग की घोषणा की। सम्पूर्ण विधान में गणिनी आर्यिका श्री अंतसमति माताजी ने पूरे विधान के मंत्र पढ़े । उन्होंने सभी लोगों को विधान का सार बहुत ही सरल अर्थों में समझाया। आप प्रारम्भ से अंत तक विधान में बैठकर सभी इंद्र-इंद्राणियों का उत्साहवर्धन करती थीं।

विगत दिवस महाआरती का सौभाग्य श्री सुरेशचंद सौरभ जैन बाबूजी को प्राप्त हुआ। आज के दीप प्रज्वलनकर्ता एवं भोजन पुण्यार्जक श्री प्रेमचंद पंकज जैन (बन्दना साड़ी) मुरैना थे। मंचासीन आर्यिका संघ को श्री प्रवीण जी, नवीन जी, दीपक जैन चैटा परिवार ने जिनवाणी भेंट की। आज की महाआरती का सौभाग्य श्री सुरेशचंद, चन्द्रप्रकाश, राजकुमार जैन एवं राकेशकुमार, सुनील जैन, मुकेशकुमार जैन (पलपुरा) को प्राप्त हुआ। श्री जिनेन्द्र प्रभु के कलशाभिषेक के बाद सकल समाज के वात्सल्य भोज की व्यवस्था श्री नरेंद्रकुमार कुलभूषण रिंकू जैन (जैना टायर) साहूला परिवार मुरैना की ओर से की गई है।

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