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विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस पर विशेष कविता : बुजुर्गों के प्रति सम्मान दर्शाती यह रचना बहुत मार्मिक


आज वरिष्ठ नागरिक दिवस है। बुजुर्ग हमारे घर में उस वटवृक्ष के समान हैं, जिसकी छाया में बचपन, जवानी और परिवार परवान चढ़ते हैं। वे अकूत आशीर्वाद के धनी होते हैं। बिल्कुल फलदार पेड़ की तरह। डडूका से पढ़िए अजीत कोठिया की यह मार्मिक कविता…


‘हम हैं तो तुम हो’

आज हम बूढ़े हो गए बेटा,

पर हमारा अनुभव

हमेशा तुम्हारा पथ प्रशस्त करेगा

हाथ पांव पस्त भले हो हमारे,

सोच अभी भी युवा है।

मन में अभी तक हमारे

बहती विकास की हवा है।

मिल जाए तुम्हारा जोश

ओर हमारा होश,

समग्र विकास का नया इतिहास

बना सकते हैं।

मत रखो अपने बुजुर्गों को उपेक्षित!

उनके सपने साकार करो

जो तुम्हे लेकर उन्होंने देखे।

उंगली पकड़ जिन्होंने तुम्हे चलना सिखाया,

मत मारो उन्हें धक्के।

परेशान हो जाता है पिता जब

एक नए नंबरी चश्मे के लिए,

तुम्हे शर्म नहीं आई

जो कहते हो समय नहीं मिला।

धिक्कार है ऐसी संतति पर।

तुम विदेश में बैठे वीडियो कॉल

पर देखते हो पिता माता की

अंत्येष्टि!!

क्या यही फ़र्ज़ है तुम्हारा?

याद रखना

ये दिन तुम्हारे भी आएंगे

तुम्हारे साथ भी ऐसा ही हुआ तो

नयन तुम्हारे भर आएंगे।

ये मन में रखना हमेशा

हम हैं तभी तुम हो।

जुड़ा है तुम्हारा भविष्य हमसे,

सुधारना है उसे तो ले लो

अपने पुरुखों की सुध।

ये कोई गैर नहीं

तुम्हारे अपने है।

इनका खून बहता है तुम्हारी रगों में ये जानो

इन्हें अपना लो पराया न मानो।

करके सेवा माता पिता की

उनके न रहने के पहले,

ये साक्षात् ईश्वर है,

बसा लो इन्हें अपने मन मंदिर में।

-अजीत कोठिया डडूका बांसवाड़ा

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