आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में कहा कि भक्ति का अर्थ गुणों का अनुराग है और भक्ति से जीवन के उपसर्ग दूर हो जाते हैं। उन्होंने शास्त्रों और उदाहरणों से समझाया कि अरिहंत भगवान की पूजा, भक्तामर और शांति भक्ति से दिव्य परिणाम प्राप्त होते हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्मसभा में मंगल देशना देते हुए कहा कि गुणों का अनुराग ही भक्ति है। भगवान की भक्ति, पूजन, अभिषेक और स्तवन से उपसर्ग दूर होते हैं और शुभ परिणाम मिलते हैं। उन्होंने धनंजय कवि का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रभु भक्ति में रमे रहने से पुत्र की मृत्यु भी जीवन में बदल गई। इसी प्रकार भक्तामर स्तोत्र, शांति भक्ति, विषापहार स्तोत्र के उदाहरण शास्त्रों में भरे पड़े हैं। आचार्य श्री ने कहा कि भगवान की पूजा बिना अभिषेक अधूरी है। अरिहंत भगवान ने साधना से चार घातिया कर्मों का नाश किया। श्रद्धा और आस्था से ही शक्ति मिलती है।
आचार्य भक्ति का महत्व बताते हुए उन्होंने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी का गुणानुवाद किया और कहा कि उन्होंने व्यसनी युवक को दीक्षा देकर पायसागर बना दिया। आचार्य पंचाचार का पालन करते हैं और शिष्यों से भी कराते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि केवल मानव ही नहीं बल्कि तिर्यंच गति के जीव भी भगवान की भक्ति कर मुक्ति पा सकते हैं। मेंढक का उदाहरण देते हुए कहा कि वह भगवान के समवशरण में फूल लेकर जा रहा था लेकिन मृत्यु होने पर शुभ परिणाम से देवगति को प्राप्त हुआ। प्रवचन से पूर्व मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी ने भी आचार्य भक्ति का महत्व बताते हुए आचार्य शांति सागर जी और आचार्य वर्धमान सागर जी का गुणानुवाद किया।













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