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सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर का आयोजन : माटी का जीवन कुंभकार के निर्देशन में स्वर्णिम बनेगा – विनोद भैया आचार्य 


सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर विगत 17 मई से अनवरत चल रहा है और हर वर्ग इसमें धर्म का ज्ञान प्राप्त कर कर्म निर्जरा कर रहा है। सुबह से ही हर वर्ग मंदिर में आना शुरू हो जाता है। उत्साह के साथ अभिषेक शांति धारा आदि में संलग्न हो जाता है, खासकर युवा वर्ग अभिषेक शांति धारा के प्रति काफी संलग्न दिखाई देता है। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट…


रामगंजमंडी। सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर विगत 17 मई से अनवरत चल रहा है और हर वर्ग इसमें धर्म का ज्ञान प्राप्त कर कर्म निर्जरा कर रहा है। सुबह से ही हर वर्ग मंदिर में आना शुरू हो जाता है। उत्साह के साथ अभिषेक शांति धारा आदि में संलग्न हो जाता है, खासकर युवा वर्ग अभिषेक शांति धारा के प्रति काफी संलग्न दिखाई देता है। जो अपने आप में एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यह बात सार्थक सिद्ध हो रही है कि शिविर संस्कारों का शंखनाद करता है। ठीक वैसा ही प्रतीत अभी हो रहा है। भीषण गर्मी के बावजूद भी धर्म अध्ययन में खासा उत्साह देखा जा रहा है। संध्या की बेला में तो चल रही कक्षाओं में तो हर वर्ग धर्म अध्ययन करने के लिए आतुर सा दिखाई देता है। प्रवचन पंडाल खचाखच भरा दिखाई देता है, जो की एक इतिहास रच रहा है ।

भक्तामर स्त्रोत की कक्षा

श्री सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर एवं मूकमाटी अर्थज्ञान शिविर के चतुर्थ दिवस प्रात: काल अभिषेक पूजनादि के उपरान्त बच्चों की सामूहिक कक्षा लेते हुए शिविर निर्देशक प्रशान्त जैन आचार्य ने उन्हें धार्मिक अध्ययन कराया, इसी क्रम में भक्तामर स्तोत्र की कक्षा लेते हुए हेमन्त जैन आचार्य के द्वारा अध्ययन कराया गया। तथा छहढाला जी की कक्षा लेते हुए मनोज जैन आचार्य के द्वारा अध्ययन कराया गया।

मूकमाटी से परिचित कराया

शिविर संयोजकआकाश जैन आचार्य ने बताया कि प्रात: स्वयंभूस्तोत्र की कक्षा सांगानेर से पधारे विनोद आचार्य के द्वारा ली गई, जिसमें उन्होंने शांतिनाथ भगवान की स्तुति को बड़े ही रोचक ढंग से पढ़ाया एवं समझाया। साथ ही सायंकाल की बेला में आचार्य श्री की जीवंत कृति मूकमाटी के अलौकिक विचारों को लौकिक उदाहरणों से समझाया। साथ ही आचार्य श्री के उन विचारों को भी समझाया गया की आचार्य श्री अप्रतिम रहे जैसे –

पूत के लक्षण पालने में इस सूक्ति का सही अर्थ यह होना चाहिए कि 

सती-संतों की आज्ञा पालने में ही पूत के लक्षण हैं न कि पालने में झूला झूलने में। साथ ही मार्मिक,कार्मिक, धार्मिक, और चार्मिक चिंतन के साथ धरती मां के द्वारा संबोधित माटी ने अपने उद्गार व्यक्त किए। माटी का जीवन कुंभकार के निर्देशन में स्वर्णिम बनेगा।

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