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धर्म प्रभावना रथ के दूसरा पड़ाव का 14वां दिन : पुरानी चीजों को लेकर बैठने से नकारात्मक भाव पैदा होते हैं – मुनि पूज्य सागर


अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के 14वें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान का हवन द्वारा समापन हुआ। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि भगवान की भक्ति-आराधना निश्चित रूप से पाप कर्म को नाश करने का कारण बनती है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के 14वें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान का हवन द्वारा समापन हुआ। सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान के अभिषेक का सौभाग्य संजय बड़जात्या, रविकांत सेठिया को व शांति धारा का सौभाग्य अशोक पाटनी लीड्स परिवार को प्राप्त हुआ।

आचार्य अभिनंदन महाराज के चित्र अनावरणकर्ता व दीप प्रज्वलनकर्ता महेंद्र पहाड़िया, स्मिता लखावत, संजय बड़जात्या, सुनील अजमेरा, गिरीश रारा, निलेश बड़जात्या, विकास रारा, दिलीप जैन नमन केटर्स, रविकांत सेठिया, प्रकाशचंद जैन रहे। अंतर्मुखी परम पूज्य मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य सूरजमल सुशीला, संजय रेखा, अर्पित कार्तिक पाटनी परिवार को प्राप्त हुआ। शास्त्र भेंट का सौभाग्य महेंद्र ममता पहाड़िया परिवार को प्राप्त हुआ।

न देखें दूसरों का दोष 

इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि भगवान की भक्ति-आराधना निश्चित रूप से पाप कर्म को नाश करने का कारण बनती है। आचार्य भगवंत कहते हैं कि जिनेंद्र भगवान की आराधना भक्ति जब गुरु के सानिध्य में होती है तो वह निश्चित रूप से असंख्यात कर्म की निर्जरा का कारण बनती है। जहां दिगंबर मुनि का सानिध्य हो जाए, उनका आशीर्वाद प्राप्त हो जाए वहां आराधना कई गुणित कर्म की निर्जरा का कारण बनती है।

श्रावक के लिए महत्वपूर्ण आराध्य देव की पूजा-अर्चना होती है क्योंकि अन्य ऐसा कोई साधन नहीं है जो कर्म की निर्जरा करा सके। मनुष्य के जन्म से मरण पर्यंत तक अनेकों घटनाएं जीवन में घटित होती हैं। उसमें कुछ अच्छी होती हैं तो वे अच्छी अनुभूति को याद दिलाती हैं और जो घटनाएं बुरी होती हैं, वे दुख का कारण बन जाती हैं।

जब श्रावक के भाव पूजा में लगते हैं, परिणाम बदलते हैं, भाव निर्मल होते हैं, तो असंख्यात गुणित कर्म की निर्जरा हो जाती है। जब सम्यक दर्शन होता है तो वह निश्चित रूप से असंख्यात गुणित कर्म की निर्जरा का कारण बनता है। पुरानी बातों को और कषायों को छोड़ते जाना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि मैं अब जो कर रहा हूं, आराध्य देव की पूजा कर रहा हूं तो वह सब पुरानी कषायों को शमन करने का कारण बनेगी और फिर आप देखना कि आपके जीवन में किस तरह से नई ऊर्जा का संचार होगा। अगर पुरानी चीजों को लेकर बैठोगे तो नकारात्मक भाव की तरफ जाओगे। नकारात्मकता अशुभ कर्म का कारण बनती है।

मुनि श्री ने कहा कि आचार्य भगवंत कहते हैं कि निस्वार्थ भाव से धर्म व गुरु की सेवा जो करता है, वह निश्चित रूप से ही अपने कर्मों की निर्जरा करता है।

उदाहरण के रूप में अगर हम गुलाब में सिर्फ कांटों पर नजर डालेंगे तो गुलाब की कीमत नहीं रह जाएगी और हम नकारात्मकता की ओर चले जाएंगे।

वहीं पर हम उस सुंदर फूल में सिर्फ फूल देखेंगे और कांटों को अलग कर देंगे तो हमें सब अच्छा ही अच्छा दिखेगा और हम सकारात्मकता की ओर जाएंगे।

दूसरों का दोष देखना कभी भी हमें शुभ कर्म की ओर नहीं ले जा सकता। यदि हम जिनेंद्र भगवान की ओर दृष्टि डालते हैं तो निश्चित रूप से शुभ कर्म के निमित्त का कारण बनेगा।

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