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सर सेठ हुकमचंदजी के जन्मदिवस 14 जुलाई पर विशेष : यश-कीर्ति और गौरव के शिखर पुरुष रहे हैं सर सेठ हुकम चंद


14 जुलाई, 1874 को इंदौर में जन्मे और 26 फरवरी, 1959 को स्वर्गवासी हुए सर सेठ हुकम चंद जी अपने समय में मालवा के वैभव संपन्न धन कुबेर और जैन जैनेत्तर समाज के शिखर पुरुषों में अग्रणी होने के साथ-साथ अनाभिषिक्त सम्राट के रूप में चर्चित थे। सर सेठ हुकम चंद जी समूचे मालवा और इंदौर के ऐसे नर श्रेष्ठ थे, जिनका संपूर्ण व्यक्तित्व उनके आत्म गौरव से भरा हुआ है। पढ़िए डॉक्टर जैनेंद्र जैन का विशेष आलेख


अपने जीवन काल में ही किवदंती बने और यश- कीर्ति और गौरव के उच्चतम शिखरों पर सुशोभित हुए सर सेठ हुकम चंद जी समूचे मालवा और इंदौर के ऐसे नर श्रेष्ठ थे, जिनका संपूर्ण व्यक्तित्व उनके आत्म गौरव से भरा हुआ एक ऐसा उज्ज्वल ध्रुवतारा है जिसके आलोक की रश्मियां आज भी हमारी चेतना में जीवंतता और शक्ति भर रही हैं एवं बरसों गुजर जाने के बाद भी इन आलोक रश्मियों की चमक धुंधली नहीं हुई है। 14 जुलाई, 1874 को इंदौर में जन्मे और 26 फरवरी, 1959 को स्वर्गवासी हुए सर सेठ हुकम चंद जी अपने समय में मालवा के वैभव संपन्न धन कुबेर और जैन जैनेत्तर समाज के शिखर पुरुषों में अग्रणी होने के साथ-साथ अनाभिषिक्त सम्राट के रूप में चर्चित थे।

देश-विदेश में पाया सम्मान

उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से न केवल देश में अपितु विदेशों में भी ख्याति और सम्मान पाया। लंदन के स्टॉक बाजार में आज भी उनकी तस्वीर प्रदर्शित है जो विदेशों में उन्हें प्राप्त सम्मान का प्रमाण और इंदौर सहित भारत के लिए गौरव की बात है। इंदौर के औद्योगिक विकास और उसे वर्तमान स्वरूप प्रदान करने में जिन महापुरुषों का सर्वाधिक योगदान रहा है, उनमें एक सर सेठ हुकमचंदजी भी थे।

चाहते थे स्वदेशी का विकास

सेठ जी स्वभावत: वणिक थे और अत्यंत धनी -मानी परिवार से आते थे। गोरांग शाही के उस युग में वे उन गिने-चुने उद्योगपतियों में से थे, जिन्होंने पराधीन भारत में स्वदेशी उद्योग धंधों का स्वप्न संजोया था। उनका सोच था कि स्वदेशी का विकास हो और देश का धन देश में ही रहे। अपने इसी सोच के चलते उन्होंने मध्य प्रदेश के सबसे बड़े नगर इंदौर में कप‌ड़ा मिलों और अन्य उद्योगों की स्थापना कर नगर का नाम देश के नक्शे में आत्म गौरव के साथ प्रतिष्ठित किया जिससे न केवल श्रम को प्रतिष्ठा मिली बल्कि हजारों हाथों को काम भी मिला और देश के साधनों, श्रम, शक्ति और धन के दोहन पर भी रोक लगी

किया इंदौर का विकास

इंदौर शहर आज यदि राज्य के उद्योग ,व्यापार और वित्तीय तथा आर्थिक ,धार्मिक एवं सामाजिक क्रिया कलापों के केंद्र बिंदु के रूप में स्थापित है तो उसकी पृष्ठभूमि में दानवीर सर सेठ हुकमचंदजी का पुरुषार्थ और उनके अवदान को नकारा नहीं जा सकता। अपने नगर के प्रति जितनी चेतना सर सेठ हुकमचंदजी मे थीं वैसी चेतना उनके समकालीन अन्य किसी भी व्यक्तित्व में विरल ही हो, यह अनुमान उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं और कृतित्व की किंवदंतियों (किस्से-कहानी) को सुनकर समझ कर एवं सन 1951 में उनके सम्मान में प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ के अवलोकन, स्वाध्याय से सहज ही लगाया जा सकता

है। अपने व्यक्तित्व के आलोक में उन्होंने अपना उद्योग व्यापार देश- देशांतर तक फैलाया और उसे विपुल गति प्रदान की, उन्होंने चीन, ब्रिटेन और अमेरिका में भी व्यापार किया एवं कोलकाता में भी हुकमचंद आयरन एंड स्टील कंपनी, जूट मिल और दि हुकमचंद इंश्योरेंस कंपनी की भी स्थापना की थी।

जनसेवा उनका लक्ष्य था और ईमानदारी जीवन की दीक्षा इन सब के ऊपर उनके व्यक्तित्व की “बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय” की छवि ने उन्हें लोक सेवा की प्रतिष्ठा प्रदान की। राजा महाराजों की तरह शान -शौकत से जीवन जीने वाले एवं स्वर्ण सज्जित कार का उपयोग करने वाले गौरव पुरुष सर सेठ हुकमचंदजी को समाज और शासन ने अनंत अलंकरणों से भी विभूषित किया जिनमें सर नाइट, दानवीर, राय बहाद्दुर , राज्य भूषण, रावराजा, जैन सम्राट, मर्चेंट किंग एवं कॉटन किंग ऑफ इंडिया अलंकरण प्रमुख हैं।

दान देने में रहते थे आगे

जरूरतमंदों और नगर एवं समाजहित में दान देने में सर सेठ हुकमचंदजी कभी पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने उद्योग और व्यापार से जो भी धनार्जन किया उसका बहुत बड़ा हिस्सा (लगभग अस्सी लाख रुपए) उस जमाने में उन्होंने सर्वजन हिताय -सर्वजन सुखाय की पुनीत भावना से जन कल्याण के लिए समर्पित भी किया। प्रथम महायुद्ध के समय उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक करोड़ दस हजार रुपए की सहायता प्रदान की थी। उनके समर्पण और उदारता का ही प्रतिफल है “सर सेठ सरूपचंद हुकम चंद जैन परमार्थिक ट्रस्ट”, जिसके माध्यम से नगर में अनेकों लोकोपयोगी गतिविधियां आज भी चल रही हैं।

सेठ साहब ने इंदौर में कई जैन मंदिर, धर्मशाला एवं भवनों का निर्माण कराया जो इंदौर की वास्तु परिदृश्यता को भव्यता प्रदान करते हैं इनमें विश्व विख्यात कांच मंदिर जो विदेशों से आयात किए गए रंग-बिरंगे कांच से निर्मित दुनिया में अपनी तरह का अनोखा जैन मंदिर है। इसके अलावा शीश महल, (जिसका विक्रय हो चुका है)ंग महल, इंद्र भवन (सेठ साहब का निवास), जंवरी बाग नसिया( जहां धर्मशाला, मंदिर एवं होस्टल) आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा आपने देश में स्थित कई जैन तीर्थों पर भी जैन मंदिर एवं धर्मशालाओं का निर्माण भी कराया। सेठ हुकमचंदजी ने अपने जीवन में राष्ट्र, धर्म, समाज, संस्कृति और इंदौर नगर की विभिन्न रूपों में सेवा के साथ नगर के विकास में जो योगदान दिया है उसे यह राष्ट्र समाज एवं इंदौर नगर कभी विस्मृत नहीं कर पाएगा ‌। वे लोक धर्म के पुरोधा के रूप में इतिहास में सदैव अविस्मरणीय रहेंगे।

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