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सम्यक दृष्टि बनने के बाद जीव विकास प्रारंभ करता है : सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया आत्मकल्याण का मार्ग


सागवाड़ा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने सम्यक दृष्टि, पुण्य-पाप, साधु धर्म और आत्मविकास पर गहन प्रवचन देते हुए आत्मकल्याण एवं मोक्षमार्ग का संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।


सागवाड़ा (राजस्थान)। पुनर्वास कॉलोनी, सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने कहा कि जो आत्मा को पावन करे वही पुण्य है और जो आत्मा का पतन करे वही पाप है। अशुभ भावों का त्याग कर शुभ और शुद्ध भावों की साधना करने वाला जीव मोक्षमार्ग पर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि सम्यक दृष्टि प्राप्त होने के बाद ही जीव का वास्तविक आध्यात्मिक विकास प्रारंभ होता है।

पुण्य और पाप का गूढ़ विवेचन

गुरुदेव ने रावण और भगवान राम के उदाहरण से पुण्यानुबंधी पुण्य एवं पापानुबंधी पुण्य का अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म के पुण्य से रावण को वैभव तो मिला, किंतु वर्तमान जीवन में पापकर्मों के कारण उसका पतन हुआ। वहीं भगवान राम ने प्राप्त वैभव का उपयोग धर्म और पुण्य कार्यों में कर आत्मविजय का मार्ग अपनाया।

साधु धर्म की महिमा

प्रवचन में गुरुदेव ने कहा कि गृहस्थ जीवन में संचित अनेक पापकर्मों का क्षय केवल दान से संभव नहीं, जबकि दीक्षित साधु अपने संयम, तप और त्याग के बल पर अल्प समय में कर्म निर्जरा की दिशा में अग्रसर हो जाता है। उन्होंने भरत चक्रवर्ती और किमिच्छिक दान का उदाहरण देते हुए साधु जीवन की श्रेष्ठता का वर्णन किया।

‘चल एकला’ का आध्यात्मिक संदेश

मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता “चल एकला, चल एकला” का भावार्थ प्रस्तुत करते हुए कहा कि जीव संसार में अकेला आता है और अकेला ही जाता है। संसार मोह-माया का मेला है, इसलिए आत्मा को ही अपना वास्तविक आश्रय मानकर आत्मचिंतन एवं आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

ज्ञान साधना ही आत्मकल्याण का मार्ग

वेबीनार में एआई के माध्यम से आचार्य श्री की अहंकार-शून्यता और ज्ञान साधना का भी उल्लेख किया गया। बताया गया कि आचार्य श्री स्वयं को ज्ञान के महासागर में एक बिंदु मानते हुए निरंतर अध्ययन, चिंतन और आत्मविकास में लगे रहते हैं तथा सभी को ज्ञान रूपी समुद्र का निरंतर मंथन करने की प्रेरणा देते हैं।

संतों एवं समाजजनों की उपस्थिति

इस अवसर पर मुनि श्री अध्यात्मनंदी, मुनि श्री सौम्यनंदी, आर्यिका सुवत्सलमति माताजी, क्षुल्लिका सुविक्षमति, बाल ब्रह्मचारी वर्ण भैया सहित समाज के अध्यक्ष नरेंद्र जी, मुनि सेवा संघ समिति के अध्यक्ष दिनेश जी, पंडित धनपाल जी तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा द्वारा दी गई।

समापन

वेबीनार में आत्मचिंतन, सम्यक दर्शन, संयम, त्याग और ज्ञान साधना को जीवन का वास्तविक मार्ग बताते हुए सभी श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण के लिए सतत प्रयास करने की प्रेरणा दी गई।

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