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सामूहिक आचरण में तो बने रहें जैन : सोचिए आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे हम


जैन धर्म में सात्विक भोजन करने का उपदेश तीर्थंकरों ने दिया। पूरे विश्व में जैन समाज की पहचान भी इसी से है। समय के चलते आज जैन परिवार भी जमीन में उगने वाले कंद जैसे आलू, मूली, गाजर, लहसुन आदि खाने लग गए हैं। जैन धर्म की संस्कृति पर कुठाराघात करती इस प्रवृति पर पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा जैन का यह विशेष आलेख… 


इंदौर। जैन धर्म में सात्विक भोजन करने का उपदेश तीर्थंकरों ने दिया। पूरे विश्व में जैन समाज की पहचान भी इसी से है। समय के चलते आज जैन परिवार भी जमीन में उगने वाले कंद जैसे आलू, मूली, गाजर, लहसुन आदि खाने लग गए हैं। वहीं प्याज जैसा तामसिक खाद्य भी भोजन में शामिल हो रहा है। इन सब के कारण हम अपनी पहचान खोते जा रहे हैं और शायद इसी वजह से मानवता कम होती जा रही है। इन सब से ऐसा लगता है कि आने वाले समय में जैन समाज का अस्तित्व ही नहीं रहेगा क्यों हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को भूलते जा रहे हैं। धार्मिक शास्त्रों में कहा गया है कि जैसा खाए अन्न वैसा होवे मन। आज देखा भी जा रहा कि भोजन का असर मनुष्य की जीवन चर्या, विचार, व्यवहार और आचरण पर पड़ रहा है।

सात्विक भोजन है सर्वश्रेष्ठ

भोजन तीन प्रकार होता है पहला सात्विक, जो मानव का श्रेष्ठ भोजन है। इस भोजन में मर्यादित और घर पर बना भोजन जिसमे मिर्च मसाले अधिक मात्रा में न हों। यह भोजन बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख, प्रीति प्रदान करने के साथ अकाल मरण से बचाता है। दूसरा राजसी भोजन जो प्रमाण, वासना को बढ़ाता है। इसमें खट्टे,अधिक नमक, बहुत गर्म, तीखा भोजन शामिल है। ऐसा भोजन चिंता और रोग को जन्म देता है। तीसरा तामसिक भोजन, जिसमें अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी भोजन आता है। यह भोजन मानव के खाने योग्य नहीं है। आज तो रात्रि भोजन की भी जो होड़ लगी हुई है, वह भी समाज के संस्कार और संस्कृति का नाश कर रही है।

अस्तित्व खतरे में

एक व्यक्ति यह सब करे तो केवल उसी पर असर पड़ता पर जब यह सब समाजिक और सामूहिक रूप से होने लग जाए तो समाज का अस्तित्व खतरे में आ जाता है। हजारों लोग कहने लग गए हैं कि आज के जैनों को सब चलता है। जैन धर्म बातों का रह गया है, मात्र नाम के जैन रह गए हैं। उनके संस्कार तो रहे ही नहीं।आप व्यक्तिगत रूप से अपने घर में कुछ भी करें, उसका पुण्य-पाप आपका है पर जब आप इसे समाजिक और सामूहिक में करते हैं, रात्रि भोजन करते हैं तो सोचे आपको तो पाप लगेगा ही, लेकिन पूरा जैन समाज भी हंसी का पात्र बन जाएगा। क्या हम अपनी मौज- मस्ती के कारण संस्कारों और संस्कृति का नाश नही कर रहे, आगे आने वाली पीढ़ी क्या कहेगी, क्या ग्रहण करेगी… यह सब सोचने का विषय है। आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, वह किसी से छिपा नहीं है। आज के बच्चे स्वतंत्र विचारों और आचरण के साथ परिवार की लाज-शर्म छोड़कर के घूम रहे हैं। आप को तय करना है कि क्या करें। आप रात को खाना और आलू आदि खाना नही छोड़ सकते तो यह आपके पाप का उदय है पर कम से कम जिस कुल में पैदा हुए हैं, उसके लिए कम से कम सामूहिक और सार्वजनिक रूप से रात्रि भोजन का आयोजन और आलू आदि का उपयोग न करने का प्रण तो ले ही सकते हैं। कोशिशि करें कि कम से कम सब के सामने तो जैन बनकर रहें।

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