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साइंस ऑफ लिविंग सत्र : बिना मन को मारे राम नहीं बना जा सकता – मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज


इंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा/संजय जैन हटा की विशेष रिपोर्ट…


हटा। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। श्री रामजी का जीवन, राजभवन से वन और वन से राजभवन एवं पुनः राजभवन से वन की यात्रा का एक ऐसा जीवन्त अनोखा उदाहरण है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को एक आदर्श मार्ग दिखा दिया।

सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में ऐसे दो महापुरुष हुये है, जो सर्वाधिक प्रसिद्धि को प्राप्त हुये हैं। एक हैं भगवान आदि ब्रह्मा आदिनाथ, जिन्हें ऋषभनाथ, वृषभनाथ भी कहते हैं। जिनके पुत्र सम्राट भरत चक्रवर्ती के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। दूसरे हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी। दोनों महापुरुषों में कई समानताएं है।

जैसे दोनों का जन्म नवमी के दिन ही हुआ। दोनों का जन्म चैत्र मास में ही हुआ। दोनों उसी भव से मोक्ष को प्राप्त हुये। दोनों के पुत्र परम पराक्रमी थे। दोनों शलाका अर्थात् प्रसिद्ध पुरुष थे। दोनों उत्तम लक्षणों से युक्त शरीर के धारी थे। दोनों देवताओं की तरह ही रूप लावण्य धारी थे अर्थात् दोनों के दाढी-मूंछ आदी नहीं थे।

विश्वव्यापी हैं राम

मुनि श्री ने कहा कि राम विश्वव्यापी व्यक्तित्व हैं। जैनाचार्यों ने भी श्री रामजी के जीवन को विश्व के सामने रखा है। आचार्य रविषेण जी महाराज द्वारा लिखित ग्रन्थराज पद्मपुराण, जो की पद्म अर्थात् राम के जीवन के जानने का सशक्त माध्यम है एवं आचार्य गुणभद्र कृत उत्तर पुराण में भी रामजी का जीवन वृतान्त अंकित है। पूरे विश्व मे लगभग हजार प्रकार से राम का जीवन पढ़ने को प्राप्त होता है।

जब भी राम जी के जीवन के चक्र पर चिन्तन करते हैं हर बार एक नया राम सामने आता है। एक ऐसा महापुरुष, जिसने अपने लिये नहीं बल्कि दूसरों के लिये ही जीवन जिया है। पहले पिता के वचनों का मान रखा, फिर पत्नी के सम्मान के लिए युद्ध किया और फिर एक न्यायप्रिय राजा होने के नाते सीता सती की परीक्षा तक के डाली।

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