राजस्थान के जैन संत व्यक्तित्व एवं कृतित्व के तहत राजस्थान में जन्में, यहीं पर संत बने और यहीं की भाषा में साहित्य की रचना कर जन-जन तक धर्म प्रभावना पहुंचाने वाले संतों ने खूब छंद लिखे। काव्य लेखन से लेकर गद्य लेखन तक धर्म की ही बात प्रमुख रही। भट्टारक अभयनंदी भी ऐसे ही संत हैं। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 27वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का ब्रह्म अभयनंदी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
इंदौर। राजस्थान के जैन संतों की श्रंखला तो विस्तृत है। कई संतों का परिचय भी विशाल है। यहां के साधु-संतों ने धर्म जागरण को प्रमुख रखकर साहित्य सृजन के माध्यम से जैन समाज में अलख जगाने का अनुपमेय कार्य किया है। राजस्थान की साहित्यिक धरती बहुत उर्वर है। यहां के संतों ने खूब रचनाएं लिखी और उन्हें शास्त्र भंडारों में संग्रहित भी करवाईं। इसी क्रम में भट्टारक अभयचंद्र के बाद अभयनंदी भट्टारक पद पर बैठे। ये भी अपने गुरु के सामान ही लोकप्रिय भट्टारक थे। शास्त्रों के ज्ञाता थे। विद्वान थे और उपदेष्टा थे। साहित्य के प्रेमी थे। यद्यपि उनकी कोई महत्वपूर्ण रचना नहीं मिली, लेकिन सागवाड़ा, सूरत, राजस्थान गुजरात के अन्य शास्त्र भंडारों में इनकी रचना संरक्षित हो सकती है। एक गीत में इन्होंने अपना परिचय दिया है।
अभयचंद्र वादेन्द्र इह…अनंत गुण निधान।
तास पाट प्रयोज प्रकासन, अभयनंदी सुरि भाण।
अभयनंदी व्याख्यान करंता, अभेमति ये थल पासु।
चरित्र श्री वाई तणे उपदेशे ज्ञान कल्याणक गाउ।
उनके शिष्य संयम सागर ने इनके बारें में दो गीत लिखे हैं। गीतों के अनुसार जालणपुर के प्रसिद्ध बघेरवाल श्रावक संघवी आसवा एवं संघवी राम ने संवत 1630 में इनको भट्टारक पद पर बैठाया। वे गौर वण एवं शुभदेह वाले यति थे।
कनक कांति शोभित तस गात, मधुर समान सुवांणिजी।
मदन मान मर्दन पंचानन, भातरी गच्छ सन्मान जी।
श्री अभयानंदी सूरी पट्ट धुरंधर, सकल संघ जयकार जी।
सुमतिसागर तस पाय प्रणमें, निर्मल संयम धारी जी।













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